Published on 2020-05-28
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Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;} Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;} आधुनिक युग में सुविधाएँ अपरिमित परिमाण में बढ़ी है। जैसे-जैसे विज्ञान के नये आविष्कार हाथ आते गए, व्यक्ति उतना ही श्रम की दृष्टि से परावलंबी तथा रहन-सहन की दृष्टि से विलासी बनता चला गया है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि जब भी व्यक्ति एकाकी प्रगति करता है उसे कहीं न कहीं तो घाटा उठाना ही पड़ता है। इस घाटे को हम आधुनिक सभ्यता का अभिशाप भी कह सकते हैं। आज दृश्यमान अस्वस्थ मानव समुदाय इसकी जीती-जागती तस्वीर है। शरीर एवं मन दोनों ही दृष्टि से रुग्ण, दुर्बल व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग तक नहीं कर पा रहा। आधुनिक प्रगति का पथ छोड़कर वापस अतीत में लौटा जाय, यह कोई विकल्प नहीं लेकिन इस पर तो पुनर्विचार हो सकता है कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही। द्रुतगामी वाहन, ध्वनि प्रदूषण, बढ़ता विकिरण, पारस्परिक प्रतिस्पर्द्धा, आरामतलबी, कृत्रिमता का जीवन के हर क्षण में अवलम्बन, पर्यावरण की विषाक्तता, उन्मुक्त स्वेच्छाचार को प्रश्रय इत्यादि कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारण ऊपर बतायी गयी परिस्थितियों के मूल में मनीषियों ने बताए हैं। अच्छा हो, मनुष्य समय रहते अपनी चाल बदले और प्रकृतिगत अनुशासन में बंधना सीखे। सृष्टि का यह एक शाश्वत नियम है कि जब भी मर्यादा का उल्लंघन होगा प्रकृति तुरन्त पलटकर दण्ड देगी। महाविनाश को आमन्त्रण आज की परिस्थितियों में मात्र युद्धोन्माद, बढ़ती आबादी, पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं दे रहे, मानवी चिन्तन की यह विकृति भी दे रही है, जो उसे परावलंबन, अन्धाधुन्ध औषधि सेवन तथा उन्मुक्त आचरण की ओर प्रेरित करती है। बढ़ती व्याधियों की इस विभीषिका से भी मानवता को त्राण पाना ही होगा। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (अखंड ज्योति सितम्बर १९८३


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