Published on 2020-06-27
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घर बार और राज-परिवार छोड़कर सिद्धार्थ ने सत्य की खोज में स्वयं को समर्पित किया तो स्वाभाविक ही था कि अनेकों कष्ट, कठिनाइयों से मुकाबला पड़ा हो। राजसी सुविधाओं के अभ्यस्त सिद्धार्थ के लिए अरण्यवास वैसे ही असुविधाजनक रहा था और फिर ऊपर से कठिन तितिक्षा, साधनायें और कठोर व्रत उपवास। भोजन की मात्रा घटाते-घटाते एकदम निराहार रहने लगे, वस्त्र इतने कम हो गये कि दिशायें ही वस्त्र बन गयीं फिर भी प्रात्वव्य दूर ही रहा। तो लगा कि मन को शान्ति ही मृगतृष्णा है। संसार आसार तो है ही परन्तु सत्य भी यही है। जिस धैर्य का सम्बल पकड़ कर वे साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और हम भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे बुद्ध। घर वापस लौटने की तैयारी करने लगे। जब वे घर की ओर लौट रहे थे, तो रास्ते में एक ठण्डे जल की झील आयी। ‘झील’ के किनारे खड़े होकर वे उसे देखने लगे। उनकी दृष्टि एक गिलहरी पर पड़ी वो बार-बार झील में डुबकी लगाती, बाहर आती, रेत में लोटती और पुनः झील में डुबकी लगाने के लिए दौड़ पड़ती। बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। देर तक वे उसे देखते रहे जब गिलहरी की क्रिया में कोई अन्तर नहीं आया तो आखिर वे पूछ ही बैठे- नन्ही गिलहरी यह क्या कर रही हो तुम।’


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