Published on 2020-07-05
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Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;} आधुनिक युग में सुविधाएँ अपरिमित परिमाण में बढ़ी है। जैसे-जैसे विज्ञान के नये आविष्कार हाथ आते गए, व्यक्ति उतना ही श्रम की दृष्टि से परावलंबी तथा रहन-सहन की दृष्टि से विलासी बनता चला गया है। यह एक निर्विवाद तथ्य है कि जब भी व्यक्ति एकाकी प्रगति करता है उसे कहीं न कहीं तो घाटा उठाना ही पड़ता है। इस घाटे को हम आधुनिक सभ्यता का अभिशाप भी कह सकते हैं। आज दृश्यमान अस्वस्थ मानव समुदाय इसकी जीती-जागती तस्वीर है। शरीर एवं मन दोनों ही दृष्टि से रुग्ण, दुर्बल व्यक्ति उपलब्ध सुविधाओं का उपभोग तक नहीं कर पा रहा।


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