Published on 2020-09-04
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स्वच्छता मनुष्यता का गौरव गन्दगी हटाने में उत्साह रहे

कई व्यक्ति गन्दगी से घृणा तो करते हैं, पर उसे हटाने से कतराते हैं। यह घृणा का विलक्षण तरीका है। चोर से घृणा तो की जाय पर जब वह घर में घुसे तो उससे दूर ही खड़ा रहा जाय, ऐसा करने से चोर को हटाया जाना कैसे सम्भव होगा? घर में कहीं बिल्ली ने टट्टी कर दी है अथवा चूहा मरा पड़ा है या कोई और ऐसी ही बात है, आप उसे छूने या हटाने से झिझकते हैं तो फिर वह गन्दगी हटेगी कैसे? मलीनता से घृणा करना उसी का सार्थक है, जो उसे हटाने के लिए जुट जाए। जिससे ऐसा न बने उसके बारे में तो यही कहा जायगा कि स्वच्छता से घृणा नहीं करता है। यदि ऐसा न होता ता गन्दगी को हटाने के लिए अपने शत्रु को खदेड़ने के वास्ते तत्परता प्रदर्शित क्यों न करता?

होना यह चाहिए कि जहाँ भी गन्दगी दिखाई दे, हम तत्काल एक क्षण भी बिना गँवाए उसे हटाने के लिए जितना अधिक उत्साही एवं सक्रिय रहेगा उसे उतना ही स्वच्छ रहने का आनंद मिलेगा। जो सफाई तो चाहते हैं पर मैलेपन को हटाने से कतराते हैं, वे भला किस तरह अपनी अपनी चाहना को साकार बना सकेंगे? जहाँ कूड़ा-करकट देखा कि बुहारी लेकर उसे झाड़ने में तुरन्त जुट गए, जहाँ सामान अस्त-व्यस्त देखा, वहाँ तुरन्त उसे यथास्थान रखने में लग गये, यह स्वभाव जिसका बन जाय, समझना चाहिए कि उसे स्वच्छता प्रिय मनुष्य का सम्मान मिलेगा। जो गन्दगी को देखकर कुड़कुड़ाता तो है, नाक भी सिकोड़ता है, पर उससे बचता-बचता फिरता है, छूना नहीं चाहता, हटाने में गन्दगी के सम्पर्क में आना पड़ता है, उससे बचता है। वह स्वच्छता का नहीं, घृणा उपासक कहा जायगा। स्वच्छता तो एक वरदान है जो उसे मिलता है जिसे गन्दगी से लड़ने की साधना करने में उत्साह रहे।


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