Published on 2020-09-06
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अभी तो मथने को सारा समुंद्र बाकी है,
अभी तो रचने को नया संसार बाकी है,।
अभी प्रकृति ने जना कहां नया विश्व है ?
अभी तो गढ़ने को नया इंसान बाकी है।।

अभी तो विजय को सारा रण बाकी है,
अभी तो करने को सारे सुकर्म बाकी है।
अभी नियति ने बाण अपने चलाए कहां हैं?
अभी तो गाण्डीवउठना अर्जुन का बाकी है।।

अभी तो हर घर पहुंचना नव संदेश बाकी है,
अभी तो विश्व सरकार का गठन बाकी है।
अभी तो हथियारों के जंगल नष्ट हुए कहां है?
अभी तो नव प्रकृति का नव अंकुरण बाकीहै।।

अभी सृजन की हर गतिविधि का होना बाकी है
अभी तो हृदय को विश्व नर का मथना बाकी है।
अभी अर्जुन नारायण के सम्मुख झुका कहां हैं?
अभी तो 21वीं सदी उज्जवल भविष्य बाकी है।।
अनुराग शर्मा


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