Published on 2020-09-06
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सभी बड़े हैं ,सभी चले हैं गुरुवर तेरी राहों में।
तरह तरह के फूल खिले हैं ,गुरुवर तेरी छांव ।।

तपती हुई रेत थी नीचे, ऊपर जेठी घाम थी
दुनिया में तो चहु ओर से मिली तपिश है आग की ,
आकर मिली हिमालय की छाया, गुरुवर तेरेेे धाम में ,
तरह तरह के फूल खिले हैं ,गुरुवर तेरी छांव ।।

हम नन्हे से सैनिक, हमसे, स्वप्न तेरे कैसे पूरे होंगे,
नन्ने- नन्ने से सही पर हम, कभी ना अधूरे होंगे,
तेरी कृपा से अणु विभु बने हैं गुरुवर तेरी चाह में
तरह तरह के फूल खिले हैं गुरुवर तेरी छांव ।।

चँहु ओर भयानक मंजर था न कहीं कोई भी आस थी
उज्जवल भविष्य बताकर कर, तुमने नई सदी की बात की,
विचार क्रांति के फूल खिले हैं गुरुवर तेरे बाग में
तरह तरह के फूल खिले हैं गुरुवर तेरी छांव

विचार क्रांति फैलाने हमको घर घर अब तो जाना होगा,
नई सदी का संविधान है हर दिल तक पहुंचाना होगा
नवयुग के नवगीत बने हैं गुरुवर तेरी ताल मे
तरह तरह के फूल खिले हैं गुरुवर तेरीछाव मेे।।
.... ..........निवेदक
अनुराग शर्मा
..... ..... मीरगंज बरेली ।।


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