Published on 2022-08-08
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पदार्थ के विज्ञान से बहुत ऊँचा है आध्यात्मिक ज्ञान। - श्रद्धेय डॉ. प्रणव जी
ज्ञान की दो धाराएँ हैं। एक पदार्थ के ज्ञान की धारा और दूसरी प्रज्ञा-श्रद्धा की धारा। एक धारा मस्तिष्क की और दूसरी हृदय की है। दोनों का समन्वय समय की माँग है। भारत को विश्व गुरू बनाने के लिए मस्तिष्क की प्रखरता चाहिए और हृदय की पवित्रता भी चाहिए। यही वैज्ञानिक अध्यात्मवाद है, जिसका प्रतिपादन परम पूज्य गुरूदेव ने किया है। हमारा समाज ज्ञानमूलक है, हमारी संस्कृति ज्ञानमूलक है। हम गुरू परम्परा के अनुयायी हैं, ऋषियों की संतान हैं। हमने न तो अध्यात्म को कम माना, न ही विज्ञान को कम माना है। पदार्थ के विज्ञान से बहुत ऊँचा है आध्यात्मिक ज्ञान। जब आइंस्टीन मरने वाले थे तब उन्हें विशिष्ट अनुभूति होती थी। वे कहते थे,‘‘संसार मिट रहा है, परिवर्तित हो रहा है।’’ वे कहते थे-‘‘मैंने जो कुछ पाया, जाना वह कुछ था ही नहीं, कहीं मैं आध्यात्मिक तो नहीं हो रहा हूँ, जो ऐसी रहस्यमयी बातें करने लगा हूँ।’’गुरूपूर्णिमा पर्व ज्ञान के अहसास का, ज्ञान की धारणा का पर्व है। हमें पूज्य गुरूदेव के विचारों को, उनके वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को घर-घर पहुँचाना है। परम पूज्य गुरूदेव का साहित्य जीवन का आमूलचूल परिवर्तन कर देने की सामर्थ्य रखता है।


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