Published on 2022-08-08
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मानव मन की गहराइयों को समझने वाली कोई शक्ति है-वह है गुरू। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरू। वह अपने शिष्य के भलाई के लिए सब कुछ करता है, जैसे ऋषि आश्वलायन ने दस्यु बन गए अपने शिष्य देवव्रत को सन्मार्ग दिखाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की और अंधेरी रात में उसकी तलवार का वार सहकर भी उसे अपनी भूल का अहसास कराया था। जीवन तो सामान्य पशु भी जीते हैं, किन्तु जो सार्थक जीवन जीते हैं वे लोकमंगल के लिए समर्पित हो जाते हैं। परम पूज्य गुरूदेव-परम वंदनीया माताजी ने अपना सर्वस्व समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया था। उनके शिष्यों को भी उसी पुण्य परम्परा का अनुसरण करना चाहिए।गुरूपूर्णिमा का दिन त्याग और बलिदान का दिन है, श्रद्धा और समर्पण का दिन है।गुरू का त्याग और शिष्य का समर्पण बड़े- बड़े चमत्कार कर देता है। भगवान राम की रामायण जब तक गाई जाती रहेगी, उनके रीछ-वानर भी याद किए जाएँगे। नवयुग के श्रीराम को जब भी कोई याद करेगा, तो गुरू की नवसृजन वाहिनी को जरूर याद करेगा। परम पूज्य गुरूदेव ने अपने बच्चों से दस हजार हीरों का हार माँगा था। हे गुरूदेव! हम सबकी कामना और भावना  यही रहे कि हम उनमें सबसे पहले हीरे हों।


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