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प्रत्येक पिता यही चाहता है कि उसका पुत्र उसकी परम्परा एवं प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण रखे। ईश्वर भी अपने युवराज मनुष्य से यही अपेक्षा करता है कि वह देव जीवन जिये, अपनी विचारणा में उत्कृष्टता और क्रियाकलाप में आदर्शवादिता की मात्रा न घटने दे। अपने सम्पर्क क्षेत्र का वातावरण ऐसा बनाये, जिसे स्वर्गोपम कहा जा सके। इसी आधार पर अपना भीतरी और बाहरी ढाँचा सुव्यवस्थित कर लेना ही-बन्धनों को तोड़कर मोक्ष पाना, नरक से निकलकर स्वर्ग में प्रवेश पाना है। यह सब दृष्टिकोण के परिवर्तन और परिष्कार से ही सम्भव हो पाता है।


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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी.....