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हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पायी जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफड़ों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी; पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है, जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप में देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता। आत्म-समीक्षा कोई कब करता है? आवश्यकता है अपने दोषों के सुधार के लिए संघर्ष करने की।


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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी.....