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अपने बारे में यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि मैं कुछ नहीं हूँ, बल्कि यह मानना चाहिए कि मैं भी इस संसार का एक महत्त्वपूर्ण घटक हूँ। परमात्मा के इस उपवन का एक सुन्दर और उपयोगी, आवश्यक फूल हूँ, जिसे असमय कुँभलाने का कोई कारण नहीं है। दूसरों के प्रति और अपने प्रति तो विशेष रूप से अपने विचारों, मान्यताओं एवं भावनाओं का मूल्य है। विश्व भर में संव्याप्त असीम बुद्धि, चेतना और प्रचण्ड शक्ति-सामर्थ्य का आवश्यक अंश प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है। अपने भीतर निहित इस शक्ति और सामर्थ्य को पहचानने की सामर्थ्य प्रत्येक व्यक्ति में होनी चाहिए और नहीं है, तो उसका विकास करना चाहिए।


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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी.....