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मिथ्या अहंकार जीवन विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है। 


बढ़ने का प्रयत्न करते रहना ही जीवन का लक्षण है और लक्ष्य भी। 

सद्विचार तब तक मधुर कल्पना भर बने रहते हैं, जब तक उन्हें कार्य रूप में परिणित नहीं किया जाता। 

अपना मूल्य गिरने न पाये यह सतर्कता, जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना ही प्रगतिशील है।

असत् से सत् की ओर, अंधकार से आलोक की ओर और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है। 

मनुष्य सबसे अधिक मूल्यवान है। उसकी रक्षा करना प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का परम कर्तव्य है। 

कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ हो जगाने और अधिक सावधानी के साथ आगे बढ़ाने की चेतावनी देने आती है। 

मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला भी जा सकता है। 

खोया हुआ पैसा फिर पाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आता। 

ऊँचे उठो, प्रसुप्त हो जाओ, जो महान् है, उसका अवलम्बन करो और आगे बढ़ो। 


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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी.....