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सभ्यता का स्वरूप है-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता ।


योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँ न गढने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।

पढ़ने योग्य लिखा जाय,इससे लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें योग्य किया जाय ।

दूसरों के साथ वैसी ही उदारता बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है ।

बुद्विमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं, मूर्ख वे हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में हैं ।

परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित है ।

जो बच्चों को सिखाते हैं उन पर बड़े खुद अमल करे, तो यह संसार स्वर्ग बन जाए ।

सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं ।

अच्छी पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमाएँ हैं  । उनकी आराधना से तत्काल प्रकाश और उल्लास मिलता है ।

मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं,वह उनका निर्माता,नियंत्रणकर्ता और स्वामी है ।


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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है, वहाँ उसकी गरिमा आरंभ होती है। फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है। अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

भगवान आदर्शो श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति मनुष्य के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः वही भगवान की भक्ति है। जाग्रत आत्माएँ कभी अवसर नही चूकतीं हैं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये.....

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सद्विचार (पं० श्री राम शर्मा आचार्य)

आलस्य से बढ़कर अधिक समीपवर्तीं शत्रु दूसरा नहीं।घमण्डी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं, ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी.....