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देवसंस्कृति आदिकाल से ही समूचे विश्व के हर क्षेत्र एवं समुदाय को सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से अनुप्राणित करने में समर्थ रही है। यदि विश्व को आज की परिस्थितियों में एक सूत्र में बांधने की बात सोची जाए, तो एक ही संस्कृति विश्व संस्कृति की बात मस्तिष्क में आती है। ऐसा स्वरूप देवसंस्कृति का ही बनता है, जो सारे विश्व की अनेकानेक संस्कृतियों के उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण अंशों का समुच्चय है। इस दृष्टि से भारतीय संस्कृति ही ऐसी है, जिसे अनायास ही मानवीय संस्कृति देव परंपराओं के उत्कृष्टतम स्वरूप की मान्यता मिल सके। 
भारत भूमि की परंपरागत महानता मात्र इतने तक ही सीमित नहीं रही है कि यहाँ के निवासी समर्थ, सुसंस्कृत एवं समृद्ध भर थे। यदि बात इतनी छोटी होती, तो इस प्रकार के उदाहरण अन्यत्र भी खोजे जा सकते थे। अपनी- अपनी परिधि में अपने- अपने ढंग से सभी उत्कर्ष अभ्युदय के प्रयत्न करते एवं योग्यता व परिस्थिति के अनुरूप सफल भी होते रहते। कौन कितना सफल हुआ, अंतर मात्र इतने का रहा। परिणामों में इस अनुपात से अंतर तो रहेगा, पर तथ्यों एवं प्रयासों का असाधारण एवं अनुपम नहीं कहा जा सकता। भारत भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी इसीलिए कहा जाता है कि उसके अपने कुछ मौलिक निर्धारण एवं प्रयास थे। इनमें सर्वोपरि यह था कि जो पाया जाए, उसे अपने पराए का भेदभाव किए बिना बांटा जाए। इस विभाजन में विशेषत: अधिक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने की नीति का पूरा- पूरा समावेश किया गया। सूर्य की ऊर्जा बादलों की सरसता एवं वायु की सजीवता बनकर इस धरती पर निवास करने वाले मनुष्य को ही नहीं, वरन् समूचे जीव जगत को सुखी समुन्नत बनाने में अपनी क्षमता लगाती है, फलत: कृतज्ञता भरा सम्मान भी पाती है। 
स्वर्ग लोक के निवासियों की संपदा उन्हीं के काम आती है। धरती वाले उस वैभव का लाभ कहाँ उठा पाते हैं? देवताओं से इस स्तर की कि जो विनम्रतापूर्वक माँगे, उसको ही अनुग्रह रूप में दिया जाए। बिना माँगे स्वत: विपन्नता को तलाशना एवं बिना याचना के उस विषमता को निरस्त करने के लिए जा पहुँचना, यह विशेषता धरती के देवमानवों में ही पाई जाती है। व्यवहार में इसे तब देखा जाता है जब कभी भूकंप, दुर्भिक्ष, बाढ़, अग्निकांड, महामारी जैसी दुर्घटनाएँ सामने आती हैं। उस समय अनेकों भावनाशील अपनी सहायता लेकर संकटग्रस्तों की सहायता को दौड़ते हैं। 
यही एक प्रमुख कारण है कि देवमानवों की मन:स्थिति एवं जीवनचर्या को सुरदुर्लभ कहा गया है। इस आनंद से वंचित रहने के कारण देवता धरती पर उतरते और मानव  जन्म लेकर अपनी आकांक्षा को पूरा करते हैं। भारत भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी इसीलिए कहा जाता रहा है कि यहाँ जन्मे और बढ़े व्यक्ति सदा से यह ध्यान रखते रहे कि  उन्हें हर स्तर का वैभव पर्याप्त मात्रा में कमाना तो है, अकेले खाना नहीं है। वरन् जो कुछ हाथ में है, उसे अपने से अधिक अभावग्रस्तों को प्राथमिकता देते हुए व्यापक क्षेत्र  में वितरित करना है। 
अतीत के विभूतिवानों देवमानवों की इस विशेषता का सर्वविदित प्रमाण यह भी है कि उनने अपने देश के कोने- कोने में सुसंस्कारिता का वैभव बढ़ाने में कोई कमी न रखी। इसके अतिरिक्त समस्त वसुधा को अपना कुटुम्ब मानकर कष्ट साध्य यात्राएँ करते हुए वे वहाँ जा पहुँचे, जहाँ पिछड़ेपन का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक था। इतिहास  साक्षी है कि अभ्युदय का वातावरण बनाने के लिए विश्व के कोने- कोने में इस भूमि की प्राणवान आत्माएँ पहुँचती और वहाँ सर्वतोमुखी प्रगतिशीलता का वातावरण बनाती रही है। बादलों की गरिमा इसीलिए है कि वे जहाँ भी पहुँचते हैं सरसता का उपहार देते हैं। सूर्य की वंदना इसीलिए है कि उसका संपर्क क्षेत्र गर्मी से रोशनी से रहित रह नहीं सकता। भारत के देवमानवों ने विश्व को जो अजस्र अनुदान दिए हैं, उनका कृतज्ञतापूर्वक अनंतकाल तक स्मरण किया जाता रहेगा। 
  
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार 


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