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व्यवहार की धर्मधारणा और सेवा-साधना सद्गुणों के जीवन में उतारने भर से बन पड़ती है। इसके अतिरिक्त दूसरा क्षेत्र मानसिकता का रह जाता है। उसमें चरित्र और भावनात्मक विशेषताओं का समावेश किया जा सके, तो समझना चाहिए लोक-परलोक दोनों को ही समुन्नत स्तर का बना लिया गया। चार वेद, चार धर्म, चार कर्म, चार दिव्य वरदान, जिन्हें कहा जा सकता है, उन चार मानसिक विशेषताओं को- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के नाम से जाना जा सकता है। 
समझदारी का अर्थ है- तात्कालिक आकर्षण पर संयम बरतना, अंकुश लगाना और दूरगामी, चिरस्थायी, परिणतियों, प्रतिक्रियाओं का स्वरूप समझना, तदनुरूप निर्णय करना, उपक्रम अपनाना। चटोरेपन की ललक में लोग अभक्ष्य-भक्षण करते और कामुकता के उन्माद में शरीर और मस्तिष्क को खोखला करते रहते हैं। ऐसे ही दुष्परिणाम अन्य अदूरदर्शिताएँ उत्पन्न करती हैं। उन्हीं की प्रेरणा से लोग अनाचार पर उतरते, कुकर्म करते और प्रताडऩा सहते हैं। समझदारी यदि साथ देने लगे, तो इन्द्रिय-संयम, समय-संयम, अर्थ-संयम अपनाते हुए उन छिद्रों को सरलतापूर्वक रोका जा सकता है, जो जीवन सम्पदा को अस्त-व्यस्त करके रख देते हैं। 
ईमानदारी बरतना सरल है- जबकि बेईमानी बरतने में अनेकों प्रपंच रचने और छल-छद्म अपनाने पड़ते हैं। ईमानदारी के सहारे ही कोई व्यक्ति प्रामाणिक और विश्वासी बन सकता है। उन्हीं को जन-जन का सहयोग एवं सम्मान पाने का अवसर मिलता है। 
उत्कर्ष अभ्युदय के लिए इतना अवलम्बन बहुत है, आगे की गतिशीलता तो अनायास ही चल पड़ती है। बेईमान वे हैं, जिन्होंने अपना विश्वास गँवाया और जिनकी मित्रता मिलती रह सकती थी, उन्हें अन्यमनस्क एवं विरोधी बनाया। बेईमान व्यक्ति भी ईमानदार नौकर रखना चाहता है। इससे प्रकट है कि ईमानदारी की सामथ्र्य कितने बढ़ी-चढ़ी है। जिनकी प्रतिष्ठा एवं गरिमा अन्त तक अक्षुण्ण बनी रहती है, उनमें से प्रत्येक को ईमानदारी की रीति-नीति ही सच्चे मन से अपनानी पड़ी है। झूठों की बेईमानी तो काठ की हाँड़ी की तरह एक बार ही चढ़ती है। 
तीसरा भाव पक्ष है-जिम्मेदारी। हर व्यक्ति शरीर रक्षा, परिवार व्यवस्था, समाज निष्ठा, अनुशासन का परिपालन जैसे कर्तव्यों से बँधा हुआ है। जिम्मेदारियों को निबाहने पर ही मनुष्य का शौर्य निखरता है, विश्वास बनता है। विश्वसनीयता के आधार पर ही वह व्यवस्था बनने लगती है, जिसके अनुसार उन्हें अधिक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी जायें, प्रगति के उच्चशिखर पर जा पहुँचने का सुयोग खिंचता चला आये, लोग उन्हें आग्रहपूर्वक बुलायें और सिर-माथे पर चढ़ाएँ। व्यक्तित्व जिम्मेदार लोगों का ही निखरता है। बड़े पराक्रम करते उन्हीं से बन पड़ता है। 
चौथी सम्पदा है- बहादुरी, हिम्मत भरी साहसिकता, निर्भीक पुरुषार्थ- परायणता। जोखिम उठाते हुए भी उस मार्ग पर चल पडऩा, जो नीति-निष्ठा के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। बुराइयाँ संघर्ष के बिना जलती नहीं और संघर्ष के लिए साहस अपनाना अनिवार्य होता है। कायर, कृपण, डरपोक, दीन-हीन, अकसर इसीलिए अपने ऊपर आक्रमण और शोषण करने वालों को चढ़-दौडऩे के लिए न्यौत बुलाते हैं कि उनमें अनीति के आगे सिर न झुकाने की हिम्मत नहीं होती। दबने, बच निकलने और जैसे-तैसे मुसीबत टालने की वृत्ति जिन्होंने अपनाई हुई होती है, वे किसी के द्वारा भी, कहीं भी, पीसे और दबोचे जाते हैं। ऐसे ही लोग हैं, जो दुष्टता के सामने भी सिर झुकाते और नाक रगड़ते देखे गए हैं। इतने पर भी उन्हें सुरक्षा मिल नहीं पाती। सभी जानते हैं कि बहादुर की अपेक्षा कायरों पर आततायियों के आक्रमण हजार गुने अधिक होते हैं। कठिनाइयों से पार पाने और प्र्र्र्रगति-पथ पर आगे बढऩे के लिए साहस ही एकमात्र ऐसा साथी है; जिसको साथ लेकर मनुष्य एकाकी भी दुर्गम दीखने वाले पथ पर चल पडऩे एवं लक्ष्य तक जा पहुँचने में समर्थ हो सकता है। 

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार


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