सफलता के मानदण्ड  - 
गुणी मनुष्य की एक सद्भावना ही इतनी लोकप्रियता प्राप्त करा सकती है, जो एक धनवान लाखों रुपये खर्च करके नहीं पा सकता। सहानुभूति का एक शब्द, संवेदना का एक आँसू और सेवा का एक कार्य सौ भार स्वर्णर् से भी अधिक मूल्यवान है।
लोकप्रियता जीवन की सफलता का एक प्रामाणिक मानदण्ड है। अनेक लोग धन-दौलत, परिवार-प्रतिष्ठा आदि अनेक अन्य बातों को जीवन की सफलता का चिह्न मानते हैं। यह सब बातें एक सामान्य संतोष पैदा करने वाली तो हो सकती हैं, किंतु इन्हें जीवन की सफलता का प्रामाणिक लक्षण नहीं कहा जा सकता।

जीवन की वास्तविक सफलता गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता में निहित है। बहुत धन-दौलत तथा शक्ति सम्पन्नता होने पर भी मनुष्य वास्तविक लोकप्रियता नहीं पा सकता, यदि उसके गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता का समावेश नहीं है।

जो गुणी है, उसका आदर क्या धनवान और क्या निर्धन दोनों ही करते हैं। गुणी मनुष्य की एक सद्भावना ही इतनी लोकप्रियता प्राप्त करा सकती है, जो एक धनवान लाखों रुपये खर्च करके नहीं पा सकता। सहानुभूति का एक शब्द, संवेदना का एक आँसू और सेवा का एक कार्य सौ भार स्वर्णर् से भी अधिक मूल्यवान है। शोक के समय किसी को दिया हुआ सान्त्वना का एक शब्द, दीन-दुःखी अथवा आपत्ति पीड़ित व्यक्ति की सेवा आर्थिक सहायता से कहीं अधिक संतोषदायक होती है। एक निर्धन, एक धनाढ्य की अपेक्षा कहीं अधिक लोकप्रियता पा सकता है यदि वह अपने में वास्तविक गुणों का विकास कर लेता है।

धनवान का धन समाज में लोकप्रियता का सम्पादन नहीं कर सकता, जब तक कि उस सहायता के पीछे सच्ची सहानुभूति अथवा संवेदना का गुण न होगा। लोकप्रियता यथार्थ में धन के दान से नहीं मिलती, बल्कि वह मिलती है उस सद्भावना के गुण के कारण जो उस दान के पीछे दमकती रहती है। बिना सद्भावना का दान एक दम्भ होता है, जो लोकप्रियता लाने के स्थान पर अधिकतर लोकापवाद ही लाया करता है।


हीरे की निराली चमक

जो सदाचारी है, सुकर्मवान है, उसका आचरण ही उसको लोकप्रिय बना देगा। लोग उस पर विश्वास करेंगे, उसे आदर की दृष्टि से देखेंगे और उसकी चर्चा करेंगे। कर्मों की श्रेष्ठता एवं निष्कलंकता में आस्था रखने वाला मनुष्य बड़े से बड़ा कष्ट उठाकर भी किसी को धोखा नहीं देगा, मिथ्याचरण अथवा आडंबर का अवलम्बन न लेगा। कोई भी ऐसा काम न करेगा जिससे वह, उसका परिवार, समाज, राष्ट्र अथवा मानवता लांछित होती हो। सुकृती के हृदय में छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारों का वेग नहीं रहता। ऐसे चारुचरित लोग अपने कर्त्तव्यों, अधिकारों अथवा शक्तियों का प्रयोग ऐसी दशा में नहीं करते जिससे उनकी नागरिकता और नैतिकता पर आँच आये। ऐसे श्रेष्ठ लोगों की तरफ लोकचित्त आकर्षित होने लगता है।

जिसका स्वभाव मधुर है, जो क्रोध के कारण पर भी शांत एवं संतुलित रहता है, छोटे-बड़े सभी व्यक्तियों से समान प्रसन्नता से मिलता और बात करता है, किसी की निंदा अथवा छिद्रान्वेषण करना जिसके स्वभाव का अंग नहीं होता, जो परदोषदर्शी न होकर परगुण गायक होता है, वह व्यक्ति सहज ही अपने श्रेष्ठ स्वभाव के कारण लोकप्रियता पा लेता है।

पावन स्वभाव के लोग निश्चय ही परमार्थ कर्मों में विश्वास रखते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार का छोटा-सा भी अवसर आने पर सुकृत स्वभाव का व्यक्ति बिना किसी प्रोत्साहन के स्वतः उसमें लग जाता है। किसी का दुःख देख आँसू भर लाना और हर्षर् देखकर पुलकित हो उठना श्रेष्ठ स्वभाव व्यक्तियों की एक प्राकृतिक विशेषता होती है। ऐसे पुनीत पुरुषों को भला कौन न जानेगा और कौन न याद करेगा। धन-वैभव एवं सुविधा-साधनों से रहित होने पर भी गुण, कर्म, स्वभाव से श्रेष्ठ व्यक्तियों को लोग सभा, समाजों में प्रमुख स्थान ही देते हैं।


गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता

गुण, कर्म, स्वभाव तीनों की श्रेष्ठता से ही वास्तविक लोकप्रियता मिलती है। कोई यदि बहुत कुछ गुणी है, बड़ा दयालु तथा दर्दीला है, उसकी सहानुभूति एवं संवेदना जाग्रत् होने में देर नहीं लगती, किंतु उसके कर्म गुणों के अनुरूप नहीं है तो उसके गुण मिथ्यात्व के दोष के भागी होंगे। किसी के आँसू देखकर आँसू तो भर लिये, किंतु उन्हें दूर करने, पोंछने अथवा बंद करने के योग्य कोई छोटा-सा भी करणीय कार्य नहीं किया तो वह सहानुभूति उसकी अपनी मानसिक दुर्बलताजन्य भावुकता ही मानी जायेगी। ऐसी निष्क्रिय भावुकता सच्ची लोकप्रियता प्राप्त नहीं कर सकती। 

जो गुणी भी है, जिसके कर्म भी उज्ज्वल हैं, किंतु स्वभाव कष्टकारक है तो लोग उसे भी पसंद न करना चाहेंगे। किसी से सहानुभूति रखकर उसकी सक्रिय सहायता करने वाला यदि भावावेश में उससे कोई कठोर बात या व्यवहार कर बैठेगा तो उसके सारे किये-कराये पर पानी फिर जायेगा। कठोर, कर्कश अथवा निराश एवं निरुत्साही व्यक्ति से कोई किसी प्रकार का सम्पर्क रखना पसंद नहीं करेगा। अस्तु वास्तविक लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का श्रेष्ठ होना आवश्यक है। 

जीवन की सफलता यह नहीं है कि किसी ने कितना धन, कितना वैभव, कितनी शक्ति तथा कितना अधिकार प्राप्त कर लिया, बल्कि जीवन की सफलता यह है कि उसने कितने लोगों का हृदय जीत लिया है, कितनों के हृदय पर मनुष्यत्व की अमिट छाप छोड़ी है, कितने लोगों का विश्वास किस सीमा तक जीता है? उसने अपने आचरण से कितने लोगों को याद करने के लिए विवश कर दिया है आदि अहैतुक लोकप्रियता ही जीवन की वास्तविक सफलता है और यह लोकप्रियता गुण, कर्म, स्वभाव तीनों की श्रेष्ठता से ही प्राप्त हो सकती है। 


जीवन की सफलता का भ्रम सस्ती लोकप्रियता

धनवान लोग समाज में अपनी पूछ तथा प्रभाव देखकर लोकप्रियता के भ्रम में पड़ जाते हैं। लोग उन्हें देखते ही नमस्कार करते हैं, गोष्ठियों तथा आयोजनों में विशेष स्थान देते हैं। दानों-अनुदानों के लिए उनकी दहलीज पर सिर झुकाते और उनको प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। 

यह घेराबंदी उस व्यक्ति के लिए नहीं, उसके धन के लिए होती है।  कल को यदि ऐसे आदमियों के पास से धन या अधिकार चला जाये तो कोई उसका समाचार तक पूछने न जायेगा। स्वार्थ निकल जाने अथवा निराश हो जाने या उस व्यक्ति का वैभव नष्ट हो जाने पर लोग उसे ऐसे भूल जाते हैं मानो वह इस धरती पर है ही नहीं। 


अनेक लोग लोकप्रियता पाने के लिए दान-दक्षिणा का कार्यक्रम चलाया करते हैं। वे लोगों की श्रद्धा-भक्ति अथवा आकर्षण पाने के लिए गरीबों को भोजन कराते हैं। अवसर उपस्थित कर ब्राह्मणों अथवा साधु-संतों को दान-दक्षिणा दिया करते हैं, तीर्थों पर सदाव्रत लगाया करते हैं। संस्थाओं की सहायता करके अपना नाम खुदवाया करते हैं। 

दान-दक्षिणा देना अच्छी बात है, किंतु यही परमार्थ अथवा परोपकार तब एक व्यापार बन जाता है जब लोग लोकप्रियता के रूप में इसका लाभ उठाना चाहते हैं। इस प्रकार की मंतव्यपूर्ण उदारता लोकप्रियता का कारण तो नहीं ही बनती, परमार्थ और परोपकार के पुण्य से भी वंचित रह जाती है। दान दिया जाये, सदाव्रत लगाया जाये, भूखे-नंगों को अन्न-वस्त्र दिया जाये, लेकिन केवल उनकी आत्मा को तृप्त करने के भाव से, उनकी आत्मा में विराजमान परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए। इस प्रकार का निःस्पृह परोपकार तथा परमार्थ ही सार्थक हो सकता है। व्यावसायिक उदारता के कृत्य निष्फल ही चले जाते हैं।  


धनवान, शक्तिवान एवं जनवान हो जाने से, जिसे लोग जीवन की सफलता समझते हैं, प्रायः लोगों में घमंड, दम्भ, प्रदर्शन, क्रोध, रोष, स्पर्धा एवं ईर्ष्या की बुराई आ जाती है। धन, जन अथवा बल के मद में चूर होकर लोग दूसरों को सताने, दबाने तथा नीचा दिखाने में ही अपनी विशेषता समझने लगते हैं। साधन सम्पन्न व्यक्ति यही चाहता है कि उसके सिवाय संसार में न तो कोई उन्नति कर पाये और न आगे बढ़ पाये। संसार का हर व्यक्ति उससे नीचे तथा आतंक में रहे। इसीलिए यदि उनकी दृष्टि किसी उठते हुए आदमी पर पड़ती है तो वे उससे ईर्ष्या करने और द्वेष मानने लगते हैं। इस बात की कोशिश करते हैं कि किसी प्रकार यह उठने न पाये। वे उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते, रोड़े अटकाते और काँटे बिछाते हैं। दूसरे को नीचे गिराने में अपनी शक्ति एवं साधन का दुरुपयोग करते हैं। जिस धन-दौलत तथा अधिकार शक्ति से इस प्रकार दोष उत्पन्न हो सकते हैं उसे जीवन की सफलता का लक्षण मानना भूल होगी। 

॥   परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य  ॥    वाङ्मय खंड- ५९ ‘प्रतिगामिता का कुचक्र ऐसे टूटेगा’ के पृष्ठ ८.२१-२३ से संकलित, संपादित



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