हरिद्वार, 13 जनवरी।
    आज की भोगवादी संस्कृति से ऊपर उठने के लिए विश्व के कोने-कोने से लोग योग और आयुर्वेद की शरण में आ रहे हैं और वे इन्हें जानने, परखने और अपनाने के लिए भारत की ओर रुख कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से अर्जेण्टिना व लाटविया का 22 सदस्यीय दल दो जनवरी से देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में प्रायोगिक अध्ययन के लिए आया हुआ है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या के मार्गदर्शन में योग विभाग व आयुर्वेद विभाग के प्रवक्ताओं की एक टीम भारतीय संस्कृति की इस अनमोल विरासत का परिचय करा रही है। दल की दिनचर्या योग, आसन व प्राणायाम से आरंभ होती है, वहीं वे श्रीराम स्मृति उपव
न में एक्यूप्रेशर पथ में स्वास्थ्य लाभ लेते भी दिखाई देते हैं। यहीं माँ भगवती प्राकृतिक आहार केन्द्र से जौ, आँवला, करेला, नींबू आदि से निर्मित जूस का सेवन करते हैं।
 
देसंविवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने दल के साथ भेंटपरामर्श के क्रम में कहा कि देसंविवि का सर्वांगपूर्ण
चिकित्सा सबसे बड़ा आकर्षण है। मात्र योग और आयुर्वेद ही नहीं, पंचकर्म, रैकी, प्राणिक हीलिंग, मर्म चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, ध्यान चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा, जैसे अनेक विधाओं द्वारा अचूक स्वास्थ्य लाभ लोगों को मिलता है। इसीलिए विदेशी आकर्षिक हो रहे हैं। डॉ. चिन्मय पण्ड्या के अनुसार देसंविवि भारतीय संस्कृति, योग व आयुर्वेद के विस्तार के लिए हर संभव प्रयासरत है। अब तक भारत के अलावा नौ देशों में इस आशय  का एमओयू हो चुका है।
http://news.awgp.org/var/news/134/DSCN9287N.jpg" height="157" width="227"> पंचकर्म विभाग की डॉ अलका मिश्रा ने मानव शरीर के 107 मर्म पाइंट के माध्यम से उन्हें डायबिटीज, आर्थराइटिस, आस्टियो आर्थराइटिस, पैरालिसिस, थायराइड आदि रोगों के सरल उपचार   का प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया। डॉ अजीत तिवारी ने नाड़ी चिकित्सा के अंतर्गत वात, कफ, पित्त का  संतुलन बनाये रखने की जानकारी दी।

अर्जेण्टिना के जार्ज बिदेन्दो कहते हैं कि देसंविवि में आकर सच्चे अर्थों में योग व आयुर्वेद को जानने का अवसर मिला है। सैड्रा जेन्डबरबा कहते हैं कि हमने कई योग संस्थानों का भ्रमण किया एवं प्रशिक्षण लिया है, पर यहाँ का अनुभव काबिलेतारीफ है। आसनों को किस प्रकार, कब, कितना और कैसे करना चाहिए, यह विस्तार से जानने का अवसर मिला। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. विजय सिंह ने किया।


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