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सौर ऊर्जा का उपयोग करें, पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाएँ

गंगा की गोद, हिमालय की छाया में स्थित तीर्थनगरी हरिद्वार में स्थापित गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में वैकल्पिक ऊर्जा के तहत सौर ऊर्जा के माध्यम से प्रतिदिन छह हजार लोगों का भोजन पकाया जा रहा है जो अपने आप में पूरी दुनिया में अनूठी मिसाल है। देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने बताया कि विश्व में पारंपरिक ऊर्जा के तहत इस्तेमाल किये जाने वाले विभिन्न यंत्रों और उपकरणों के माध्यम से विश्व का तापमान बढ़ रहा है जिसके मद्देनजर इस वैकल्पिक ऊर्जा को लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनाया गया है। उन्होंने कहा कि गुजरात के बलसाड के गढिया सोलर और उत्तराखंड वैकल्पिक ऊर्जा संस्थान के सहयोग से शांतिकुंज ने इस अकल्पनीय वैकल्पिक ऊर्जा को साकार किया है और छह हजार लोगों के लिए चावल, दाल, सब्जी और गरम पानी तैयार करने का काम किया जा रहा है।

डॉ. पण्ड्या ने कहा कि शांतिकुंज में औसतन तीन हजार लोग एक वक्त का भोजन करते हैं और दोनों वक्त मिलाकर छह हजार लोगों के लिए भोजन पकाया जाता है। इनमें एक हजार उनकी संख्या है जो स्थाई रूप से रह कर भोजन ग्रहण करते हैं। उन्होंने बताया कि वैकल्पिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए शांतिकुंज के भोजन भवन के ऊपर सौर ऊर्जा की विशाल प्लेटें लगाई गई हैं जिनके माध्यम से भोजन पकाने वाले बर्तनों को भाप से इतना अधिक गर्म किया जाता है कि विशाल बर्तन में रखा अनाज खूब अच्छी तरह से पक जाता है और वह स्वादिष्ट भी होता है। वैकल्पिक ऊर्जा प्लांट के लिए भोजन भवन के पास एक अलग से एक बड़ा सौर ऊर्जा केन्द्र बनाया गया है।

डॉ. पण्ड्या ने कहा कि शांतिकुंज में चलने वाले संगीत प्रशिक्षण कार्यक्रम, संजीवनी साधना, युग शिल्पी सत्र के लिए सैकडों लोग यहां आते हैं। इसके साथ साथ हरिद्वार में तीर्थ के लिए भी जो लोग आते हैं वे शांतिकुंज का भ्रमण करते हैं। शांतिकुंज में उन लोगों के लिए मुफ्त में भोजन एवं आवास की व्यवस्था की जाती है, जिनकी संख्या दोनों वक्त मिलाकर करीब छह हजार तक हो जाती है। उन्होंने कहा कि भोजन पकाने में पारंपरिक ऊर्जा के तहत कई क्विंटल लकडी और गैस खर्च होती है जिसे इस विधि से बचाने का काम किया जा रहा है। वर्ष 1985 में शांतिकुंज के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा ने सौर ऊर्जा के लिए एक छोटा यंत्र लगाया था जो आज भी शांतिकुंज में देखा जा सकता है। आचार्य द्वारा शुरू की गई पवन चक्की अभी भी शांतिकुंज को ऊर्जा की आपूर्ति कर रही है।

उन्होंने बताया कि शांतिकुंज की तकनीक को अपनाकर देश के अन्य विशाल संस्थान भी अपनी ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इससे न केवल पारंपरिक ऊर्जा की बचत होगी बल्कि विश्वस्तर पर तापमान में जो बदलाव आ रहा है उसे भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। सौर ऊर्जा का इस्तेमाल कर न केवल पूरे देश में बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी पर्यावरण संरक्षण को बढावा दिया जा सकता है। कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने कहा कि शांतिकुंज के सहयोग से संचालित देव संस्कृति विश्वविद्यालय में जल्द ही वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत से जुडे पाठयक्रम शुरू किये जायेंगे।


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