देसंविवि के नये शैक्षणिक सत्र के गीता की प्रथम कक्षा में डॉ पण्ड्याजी ने कहा 

भगवान से बात करने के लिए पवित्रता आवश्यक

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ प्रणव  पण्ड्याजी ने कहा कि भगवान से बात करने के अधिकार प्राप्त करने के लिए अंदर से बाहर तक पवित्र, निर्मल होना आवश्यक है। इसके बिना उनसे बात नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि हर युग में भगवान की बात बताने के लिए हजारों लोग आते हैं और वे शांति, मोक्ष का उपदेश देते हैं, जबकि स्वयं अशांति भरे जीवन जी रहे होते हैं।

उक्त बातें देसंविवि के शैक्षणिक सत्र 2014- 15 के गीता की पहली कक्षा को सम्बोधित करते हुए कुलाधिपति डॉ पण्ड्याजी पण्ड्या ने कही। उन्होंने कहा कि गीता में दो मुख्य चरित्र हैं- एक अर्जुन का और दूसरा दुर्योधन का। अर्जुन वह जो संवेदना, करूणा, ममता, से भरा है, जो सीधा व सरल है एवं दुर्योधन वह जो लोभ, लालच, अहंकार से भरा है, जो भगवान के सामने होने पर भी उन्हें पहचान नहीं पाता। दुर्योधन के अंदर तमस् ही तमस् है जबकि अर्जुन के अंदर प्रकाश ही प्रकाश है इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता अर्जुन को सुनाई।

कुलाधिपति ने कहा कि गीता का नियमित पठन- पाठन भगवान के प्रति आस्था जगाता है और उनके प्रति सच्ची आस्था रखने वाले लोग हर क्षेत्र में सफलता अर्जित करते हैं। अर्जुन, मीरा, तुलसीदास सहित अनेक लोग भगवान के प्रति सच्ची आस्था व प्रीति के कारण ही हर परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। उन्होंने कहा कि स्वार्थ पर संयम करने से ही आत्मसत्ता का ज्ञान होगा। अहंकार ही नरक है। अहंकारी व्यक्ति क्रूर, संवेदनहीन, ईश्वर से विमुख होता है और संकीर्णता से ग्रस्त रहता है। उन्होंने कहा कि अहंकार ज्ञान अर्जन में सबसे बड़ा बाधक हैं, अतः विद्यार्थियों को विशेष रूप से इससे बचना चाहिए।

इस दौरान कुलाधिपति डॉ  पण्ड्याजी  से विद्यार्थियों ने अपने ध्यान, साधना, योग आदि से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान पाया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर श्रीगीता जी की आरती में छात्र- छात्राओं ने भाग लिया। इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, कुलसचिव श्री संदीप कुमार, विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, छात्र- छात्राएँ एवं अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 





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