ज्योति पर्व आया है फिर से लिए अमित अनुदान।
तन, मन, चित्त सभी ज्योतित हों, सबका हो उत्थान॥
दें सुविवेक सभी को गणपति, माँ लक्ष्मी शुभ दान।
पावें सब सुख-सुयश-संपदा, होवे जन कल्याण॥



ज्ञान की ज्योति जागे

सांसारिक सुखों की उपलब्धि के लिये शरीर-बल आवश्यक है। धन हो तो प्रत्येक मनोवांछित वस्तु सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं। जनशक्ति के आधार पर अयोग्य व्यक्ति तक सत्तारूढ़ हुए हैं। चातुर्य, पद, सत्ता आदि से कोई भी व्यक्ति मनचाही इच्छायें पूरी कर सकता है। किन्तु ज्ञान के अभाव में यह सारी शक्तियाँ लघु प्रतीत होती हैं।

ज्ञान संसार का सर्वोत्तम बल है। इसी के आधार पर दूसरी सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। अज्ञानवश मनुष्य तन, धन, जन सभी का नाश कर लेता है। कितने दिन धन ठहरेगा और कब तक दूसरों में सहयोग सहानुभूति व आत्मीयता मिलेगी? मनुष्य ज्ञान के अभाव में ही बुरे कर्मों की ओर प्रेरित होता है। इसलिये संसार में ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ बल कहा गया है।

बुद्धिमान व्यक्ति कम से कम साधनों में भी संतुष्ट दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि अज्ञानता के दुष्परिणामों से वे बचे रहते हैं। उनके प्रत्येक कार्य में विवेक होता है, जो कुछ करते हैं उसे पहले भली प्रकार सोच-समझ लेते हैं। पूरी तरह विचार करने के बाद किये गये कार्यों से हानि की सम्भावना प्रायः समाप्त हो जाती है। कदाचित परिस्थितिवश कोई विघ्र आ जाए तो अपनी दूरदर्शिता के कारण बुद्धिमान व्यक्ति ही उसे आसानी से हल कर लेते हैं।

महानता एवं मोक्ष का आधार

जीवन की सही दिशा निर्माण करने की क्षमता न तो धन में है, न पद और प्रतिष्ठा में। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया सत्कर्मों से पूरी होती है। सन्मार्ग में भी कोई स्वतः प्रवृत्त होता हो यह भी नहीं कहा जा सकता। यह प्रेरणा हमें औरों से मिलती है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करते हुए भी महानता की मंजिल तक पहुँचने का नियम बना हुआ है। ऐसी बुद्धि किसी को मिल जाये तो उसे यह समझना चाहिए कि परमात्मा की उस पर बड़ी कृपा है। ज्ञान से मनुष्य की ऐसी ही धर्म-बुद्धि जाग्रत होती है, इसलिये ज्ञान को परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान मानना पड़ता है।

मानवीय-प्रतिभा का विकास ज्ञान से होता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सभी के महान व्यक्तित्त्व का विकास ज्ञान से हुआ है। भगवान राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, ईसा मसीह, सुकरात आदि सभी महापुरुषों ने ज्ञान की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। सांसारिक दुःखों से परित्राण पाने के लिये मानव जाति को सदैव ही इसकी आवश्यकता हुई है। शास्त्रकार ने ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है-

मोक्षस्य न हि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा।

   अज्ञानहृदयग्रन्थिर्नासौ मोक्ष इति स्मृतिः।।

- (शिव-गीता)

   अर्थात् मोक्ष किसी स्थान विशेष में उपलब्ध नहीं होता। इसे पाने के लिए गाँव-गाँव भटकने की भी आवश्यकता नहीं। हृदय की अज्ञान ग्रंथि का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है।
विद्या-विनय सम्पन्न बनें

इस युग में विज्ञान की शाखा-प्रशाखायें सर्वत्र फैली हैं। प्रकाश, ताप, स्वर, विद्युत, चुम्बकत्व और पदार्थों का जितना वैज्ञानिक शोध इस युग में हुआ है, उसी को ज्ञान मानने की आज परम्परा चल पड़ी है। इसी के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन भी हो रहा है। तथाकथित विज्ञान को ही ज्ञान मान लेने की भूल सभी कर रहे हैं, किन्तु यह जान लेना नितान्त आवश्यक है कि ज्ञान बुद्धि की उस सूक्ष्म क्रियाशीलता का नाम है जो मनुष्य को सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करती है। विज्ञान का फल है इह लौकिक कामना पूर्ति और ज्ञान का सम्बन्ध है अन्तर्जगत से। ज्ञान वह है जो मनुष्य को आत्मदर्शन में लगावे।

इसके लिए प्रमाद को त्याग कर विनम्र बनना पड़ता है। जो केवल अपनी ही अहंता प्रतिपादित करते रहते हैं, जिन्हें केवल अहंकार प्यारा है, वे अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण ज्ञान के आनन्द और अनुभूति को जान नहीं पाते। छोटे से छोटा बन जाने पर ही महानता की पहचान की जा सकती है। गल्ले के भारी ढेर पंसेरियों से तौले जाते हैं। कपड़ों के थान गजों से नापते हैं। अमुक स्थान कितनी दूर है, यह मील के पत्थर बताते हैं। ऐसे ही विराट के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए, महानता से गठबन्धन करने के लिए, हमें विनम्र बनना पड़ता है। भय, लज्जा और संकोच को त्याग कर तत्परतापूर्वक अपनी चेष्टाओं को उस ओर मोड़ना पड़ता है। तब कहीं ज्ञानवान बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

सिद्धियों का स्रोत है ज्ञान

अपने पास धन हो तो संसार की अनेक वस्तुयें खरीदी जा सकती हैं, शारीरिक शक्ति हो तो दूसरों पर रौब जमाया जा सकता है। इनसे दूसरों पर शासन भी कर सकते हैं तथा औरों के अधिकारों का अपहरण भी कोई बलशाली कर सकता है। किन्तु विद्या किसी से खरीदी नहीं जा सकती, दूसरों से छीनी भी नहीं जा सकती। इसके लिए एकान्त में रहकर निरन्तर शोध, अध्ययन और पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। अपनी मानसिक चेष्टाओं को सरस व मनोरंजक कार्यक्रमों से मोड़ कर इसमें लगाना पड़ता है। ज्ञानार्जन एक महान तप है। इसे प्राप्त करने के लिए दृढ़ता, मनस्विता और अध्ययनशीलता अपेक्षित है। इसे प्राप्त कर लेने के बाद खो जाने का भय नहीं रहता।

ज्ञान को आत्मा का नेत्र कहा गया है। नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए सारा संसार अन्धकारमय है। इसी प्रकार ज्ञान विहीन व्यक्ति के लिए इस संसार में जो कुछ उत्कृष्ट है उसे देख सकना असम्भव है। ज्ञान के आधार पर धर्म का, कर्तव्य का, शुभ-अशुभ का, उचित-अनुचित का विवेक होता है और पाप प्रलोभनों के आकर्षणों के पार यह देख सकना सम्भव होता है कि अन्ततः दूरवर्ती हित किसमें है। अज्ञानी व्यक्ति यह सब जान नहीं पाते। इन्द्रियों की वासना और प्रलोभनों की तृष्णा जीव को मनमाना नाच नचाती रहती है और अन्त में उसे पतन के गहरे गर्त में धकेल देती है। इस दुर्दशा से बचाव तभी  हो सकता है जब ज्ञान दीपक का प्रकाश हो रहा हो और विवेक के नेत्र खुले हुए हों।

भगवान राम ने जब गुरु वसिष्ठ जी से सांसारिक क्लेशों के भव बन्धनों से छुटकारे का उपाय पूछा तो उन्होंने यही कहा कि यह सब बिना ‘ज्ञान’ प्राप्ति के सम्भव नहीं। यदि भव सागर से पार होने की इच्छा है तो सबसे प्रथम ज्ञान-संचय का प्रयत्न करो। योगवासिष्ठ में इस सम्बन्ध में बहुत बल दिया गया है -

ज्ञानान्निर्दुःखतामेति ज्ञानादज्ञान संक्षयः।

ज्ञानादेव परासिद्धिर्नान्यस्माद्राम वस्तुतः।।

          (योगवासिष्ठ ५/८८/१२)


हे राम! ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है। ज्ञान से ही परम सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं।

वाङ्मय ‘भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्व’, पृष्ठ-३.१५३ से संकलित, संपादित





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