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मुख्यमंत्री देसंविवि में साहित्य विस्तार पटल का करेंगे उद्घाटन

हिन्दू नववर्ष की गणना किसी काल, देश से नहीं, वरन् खगोल शास्त्र पर आधारित है। आज का दिन देश के कुछ क्षेत्रों में गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के रूप में भी मनाया जाता है। अखिल विश्व गायत्री परिवार के मुख्यालय शांतिकुंज में भी देश- विदेश से हजारों साधक नवसंवत्सर के स्वागत एवं विशेष साधना अनुष्ठान के लिए पहुँचे हैं। इन साधकों का सायं विशेष अनुष्ठान संकल्प हुआ, इसके अंतर्गत वे साधना काल के नियम व अनुशासन के सूत्र में बंधे

ये साधक नवमी तक भारतवर्ष को पुनः जगद्गुरु के बनने की दिशा में सामूहिक जप, तप, हवन करेंगे। ऐसे तो शांतिकुंज में नित्य सैकड़ों लोग नियमित रूप से साधना करते हैं। गायत्री परिवार प्रमुख डॉ प्रणव पण्ड्याजी ने कहा कि नवरात्रि का पर्व मुहूर्त विज्ञान की दृष्टि से ही नही, वरन् साधना पद्धति के कारण भी महत्त्वपूर्ण है। इन दिनों साधना के नियम का पालन करते हुए उपासना करने से आत्म कल्याण और जीवन साधना की प्रगति का द्वार खुलता है। उन्होंने कहा कि अपने भीतर श्रेष्ठतम को उभारने और उन्हें आमंत्रण देने का नाम ही साधना है।

देसंविवि के कुलाधिपति डॉ पण्ड्याजी ने कहा कि चैत्र प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाले इस नव संवत्सर का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर जनमानस तक खरी उतरी है। यह कालगणना गौरवशाली एवं पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है। उन्होंने कहा कि ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की और इसे ही भारतीय मान्यता के अनुसार हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का आरंभ मानते हैं। उन्होंने कहा कि इसी प्रतिपदा के दिन कई हजार वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शासकों से भारत- भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उन्होंने कहा कि इस नवसंवत्सर को ‘कीलक’ का नाम दिया गया है।

देसंविवि के प्रतिकुलपति डॉ चिन्मय पण्ड्या ने बताया कि ‘कीलक’ नवसंवत्सर के शुभारंभ के अवसर पर (२१ मार्च को) युग साहित्य विस्तार वर्ष के अंतर्गत युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा रचित सत्साहित्यों के विस्तार पटल के क्रम में विवि परिसर में बने स्टाल का उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत जी करेंगे। 


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