योग दिवस से उभरी ऊर्जा के सुनियोजन हेतु ठोस प्रयास हों -

Published on 2015-06-23
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योग के सर्वसुलभ-समग्र रूप को जन-जीवन में स्थान मिले


यह अनोखा सुयोग -
 
योग दिवस को लेकर सारे विश्व में जो सहमति बनी है, जो उमंग उभरी है, उसे एक अनोखा सुयोग ही कहा जा सकता है। इसके पीछे ऋषितंत्र की दिव्य प्रेरणा- सक्रियता का आभास सहज ही होता है। घटनाक्रम पर एक दृष्टि डालें- 

भारत द्वारा विश्व योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखते ही विश्वभर के लगभग १७७ देशों के समर्थन से प्रस्ताव पास हो गया। 

भारत के सपूतों ने अपनी जिम्मेदारी का बोध किया तथा राजतंत्र व जनतंत्र के स्तर पर उसे विस्तार देने की पहल की गयी। कुछ ही महीनों में विश्व के १९२ देशों (जिनमें ४७ इस्लामिक व्यवस्था वाले देश भी हैं) में योग दिवस पर सार्वजनिक, सामूहिक योगाभ्यास की व्यवस्था बन गयी। 

साम्प्रदायिक सोच के कुछ व्यक्तियों के मनों में संदेह के भाव जागे, लेकिन समझदारों ने उनकी शंकाओं का समाधान करते हुए, सम्प्रदाय भेद से ऊपर उठकर योग दिवस के प्रति समर्थन- सहयोग की हवा बना दी। योग दिवस के लिए आवश्यक न्यूनतम कार्यक्रमों के बारे में सहमति बन गयी। 

अनुमान लगाया गया है कि विश्व की लगभग ७ अरब जनसंख्या में से लगभग २ अरब नर- नारी योग दिवस के कार्यक्रमों में एक साथ भाग लेंगे। यह अपने आप में एक अनोखा कीर्तिमान होगा। 
  
इतने कम समय में, सामान्य प्रयासों से ऐसा वातावरण बन रहा है तो इसके पीछे किसी दिव्य योजना, दिव्य सत्ता की सक्रियता का आभास सहज ही होने लगता है। इस प्रसंग में योगी श्रीअरविंद का कथन याद आता है- 

‘‘विश्व का भविष्य भारत के साथ जुड़ा हुआ है। भारत के सौभाग्य का सूर्य उगेगा और अपने प्रकाश से पूरे भारत को भर देगा। वह प्रकाश भारत, एशिया तथा सारे विश्व को  आप्लावित कर देगा। तब प्रत्येक घंटा, प्रत्येक क्षण, इन्हें ईश्वर द्वारा निर्धारित दिन के प्रकाश के निकट ही लाता रहेगा।’’ 

स्वामी विवेकानन्द, युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी स्पष्ट शब्दों में ऐसा होने की घोषणाएँ समय- समय पर की हैं। यह सुयोग भी उसी दिव्य योजना की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में अनुभव किया जा रहा है। योग के माध्यम से विश्वमानस एकता, समता, शुचिता एवं ममता के सुसंयोग की तरफ बढ़ रहा है। दिव्य अनुग्रह से प्राप्त इस सुयोग का लाभ हम सबको उठाना चाहिए। योग दिवस से उभरे उत्साह को योग के अनुशासन और अनुबंधों से जोड़ने के प्रयास निरन्तर करते रहना चाहिए। 

योग के अनुशासन- अनुबंध 

योग का अर्थ है जुड़ना- एक हो जाना। भारत के ऋषियों- मनीषियों ने परमात्मा को ही परम लक्ष्य माना है, इसलिए एकरूप होने का भाव उसी के साथ जुड़ा है। श्रीअरविंद जी ने इसे सुगम शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया है- 

‘‘उस सर्वोच्च सत्ता के साथ सभी प्रकार से एकरूप हो जाना ही योग है। मनुष्य में व्याप्त ईश्वर के साथ अपनी भावना, समझ, अपने मन और विभूतियों सहित एक हो जाना ही योग है। ’’ 
योग- साधक जब सर्वोच्च सत्ता के साथ जुड़ता है तो उसके शरीर, मन, बुद्धि की सामर्थ्य अवश्य विकसित होती है। विकसित शक्तियों को कुयोग से बचाकर सुयोग में लगाने के अनुबन्ध- अनुशासन योग साधना के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े हैं। इसीलिए योग के अंगों में सबसे पहले यम- नियम का उल्लेख है। 

यम : योग- साधक को यह व्रत ले लेना चाहिए, अनुशासन बना लेना चाहिए कि योग साधना से प्राप्त शक्तियों को इन्हीं मर्यादाओं में रखेंगे। इन्हें यम कहते हैं। ये पाँच हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह। इन अनुशासनों, व्रतों का पालन करने से योग से प्राप्त शक्तियों का सुनियोजन किया जा सकेगा। 

अहिंसा : अपनी शारीरिक- मानसिक आदि विभिन्न शक्तियों से किसी को सतायेंगे नहीं। यदि गलत दिशा में शक्तियाँ लग गयीं तो योग के उद्देश्य के लिए वे बचेंगी ही नहीं। साधक भटक जायेगा। यह पहला अनुशासन है। 

सत्य : बचाई हुई शक्तियों को सत्य की शोध में, सत्य के, श्रेष्ठ के अनुगमन में संकल्पपूर्वक लगाया जाय। यह दूसरा अनुशासन है या व्रत है। 

अस्तेय : चतुराई बढ़ने पर दूसरों का हक चुरा लेने, छीन लेने की प्रवृत्ति पनपती है। जीवन को पारदर्शी बनाकर- चोरी छुपे अपनी इच्छा पूरी करने से बचना यह तीसरा अनुशासन है। 
ब्रह्मचर्य : हमारा लक्ष्य ब्रह्म- परमात्मा है। अपनी जीवनचर्या उसी के अनुकूल बनाकर चलने की साधना ब्रह्मचर्य साधना है। इससे लक्ष्य प्राप्ति की अपनी सामर्थ्य और कुशलता बढ़ती है। इस व्रत का अभ्यास बढ़ाते रहना जरूरी है। 

अपरिग्रह : जब सामर्थ्य बढ़ती है तो मनुष्य ईमानदारी और मेहनत से भी अपनी आवश्यकता से बहुत अधिक कमा सकता है। आवश्यकता पूर्ति के बाद बची हुई सम्पदा का संचय होने लगता है। यह परिग्रह है। इकट्ठी सम्पदा यदि सदुद्देश्य में नहीं लगाई गयी तो वह व्यसन में लग जाती है। इसलिए योग साधक को आवश्यकता से अधिक संग्रह भी नहीं करना चाहिए। यह अपरिग्रह है। 

इन अनुशासनों- व्रतों का पालन करने वाले साधक की शक्ति कुयोग से बचकर सत्कार्यों- सदुद्देश्यों में लगने लगती है। इससे योग का लक्ष्य सहज प्राप्त होने लगता है। जो इन अनुशासनों- व्रतों का पालन नहीं कर पाते, वे योग से भटक जाते हैं- योगभ्रष्ट हो जाते हैं। इसलिए यमों- अनुशासनों, व्रतों का अनुपालन अवश्य करना चाहिए। 

नियम : लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए कुछ आन्तरिक सामर्थ्यों की जरूरत पड़ती है। कोई भी सामर्थ्य अचानक नहीं बढ़ाई जा सकती। उसे नियमपूर्वक अभ्यास से ही बढ़ाया जाता है। इसलिए योग के लिए ५ यमों के साथ ५ नियमों के अभ्यास का भी विधान बनाया गया है। वे हैं- 

१. शौच- स्वच्छता- सफाई के लिए किये गये प्रयासों को कहते हैं। शरीर और मन को रोगमुक्त रखना है तो शारीरिक- मानसिक विकारों को हटाते रहने का नियम बनाना ही होगा। शौच की साधना न करें तो व्यायाम करते हुए भी स्वस्थ- समर्थ बनना संभव नहीं है। शौच को नियमों में शामिल रखना जरूरी है। 
२. संतोष- प्रसन्न रहना मनुष्य का सहज स्वभाव है। छोटा बालक स्वस्थ है, उसका पेट भरा है तो वह हर स्थिति में मुस्कराता, मस्त रहता है। योग साधक को पुरुषार्थ करते हुए जो मिले उसमें प्रसन्न- तुष्ट रहने का अभ्यास करना चाहिए। तुष्ट- सहज प्रसन्न रहने का अभ्यास नित्य नियम पूर्वक करना चाहिए। 
३. तप- योगी के उद्देश्य ऊँचे होते हैं। ऊँचे उद्देश्यों के लिए उच्च स्तरीय पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। आवश्यक पुरुषार्थ प्रसन्नता पूर्वक करना ही तप है। जो कठिनाई कहकर इससे बचना चाहते हैं वे प्रगति नहीं कर पाते। इसलिए ऊँचे उद्देश्यों के लिए कठिनाइयों को पार करने की तप साधना भी योगी के नियमों में होनी चाहिए। 
४. स्वाध्याय- संसार गुण- दोषों के संयोग से बना है। ऊँचे आदर्शों की ओर बढ़ने वालों को हीन विचार विचलित करने का प्रयास करते रहते हैं। स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठ विचारों को जाग्रत् रखने से हीन विचार असर नहीं कर पाते। इसलिए सद्विचारों का अध्ययन करते रहना जरूरी है। कई लोग विचारों को पढ़ते तो रहते हैं, किन्तु मनन- चिंतन द्वारा  अपने स्वभाव, जीवन से जोड़ नहीं पाते। इसलिए भी विचारों का लाभ नहीं मिल पाता। अस्तु योग साधक को अपने नियमों में सद्विचारों का अध्ययन तथा उन्हें जीवन में आत्मसात करने की प्रक्रिया को अवश्य स्थान देना चाहिए। 
५. ईश्वर प्रणिधान- इसका अर्थ है ईश्वर को अपने अंदर धारण या स्थापित करना, उसे अनुभव करना। लोग अधिकतर ईश्वर की पूजा करते हैं। उन्हें अपने से भिन्न मानकर उनसे अपने इच्छित कार्यों में सहयोग की प्रार्थना करते हैं। योग साधक को पूजा नहीं, प्रणिधान करना होता है। ईश्वर को अपने अंदर धारण- स्थापित करने की साधना नियम पूर्वक करनी पड़ती है। साधक ईश्वर के साथ अभिन्नता का बोध करता है। फिर सब कुछ उसकी साक्षी में होता है तो भटकाव की स्थिति नहीं बनती। 
यम- नियमों के पालन से योग साधक की जीवन धारा की दिशा सही बनी रहती है। फिर आसन- प्राणायाम से बढ़ी हुई ऊर्जा कुयोग में प्रयुक्त नहीं होने पाती। प्रत्याहार से शुद्ध हुआ मानस धारणा, ध्यान, समाधि के सोपानों को सहजता से पार कर पाता है। 

सतत संपर्क- समाधान 

योग दिवस के क्रम में जो व्यक्ति योग धारा से जुड़ने के लिए उत्साहित हो जायें, उन्हें समग्र- सर्वसुलभ योग की दिशा में आगे बढ़ने के प्रयत्न चालू रखने चाहिए। उन्हें उनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुसार योग विधा से जुड़ने और तद्नुसार आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित- प्रशिक्षित करने- कराने की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। कुछ अपनाने योग्य क्रम इस प्रकार हैं- 

जो नर- नारी योग दिवस के कार्यक्रम में शामिल हुए उनसे भराये गये संकल्प पत्रों को क्षेत्रवार छाँट लिया जाये। क्षेत्रीय कार्यकर्ता को उनसे संपर्क साधने तथा उन्हें आगे बढ़ाते रहने की जिम्मेदारी सौंपी जाये। इसके लिए अभ्यास और प्रशिक्षण के क्रम भी चलाये जायें। 
अपने केन्द्रों, शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा मंदिरों आदि में नियमित दिनों एवं समय पर मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण सत्र चलाये जा सकते हैं। 

अन्य संगठनों को जो इस दिशा में कार्यरत हैं, उन्हें भी योग साधक को केवल शारीरिक क्रियाओं तक सीमित न रखकर सहज और समग्र योग के लिए प्रेरित करने की सलाह देनी चाहिए। 

अन्य सम्प्रदाय वालों को आसन, प्राणायाम के साथ ईश्वर प्रणिधान का भाव जोड़ने की प्रेरणा दी जा सकती है। उन्हें इसके लिए अपने इष्टनामों एवं इष्टमंत्रों के उपयोग की बात समझायी जा सकती है। इससे उनके मन का संकोचभाव हट जायेगा और वे सहज भाव से इस दिशा में लग सकते हैं- 

आसन : आसनों के साथ इष्टस्मरण करना लाभदायक होता है। विभिन्न सम्प्रदायों के व्यक्तियों को उस दौरान अपने- अपने विश्वास के आधार पर इष्टस्मरण का सूत्र समझा देना चाहिए। 

सूर्य नमस्कार- आसनों की एक शृंखला है। उसकी विभिन्न स्थितियों में सामान्य रूप से सूर्य के विभिन्न नामों का स्मरण करने की परिपाटी चल पड़ी है। इसमें भी अपने साम्प्रदायिक विश्वासों के अनुसार ईश्वर के विशेषणों का स्मरण किया जा सकता है। उदाहरण के रूप में इस्लाम के बंदे उसके साथ ‘‘या परवरदिगार (हे परमात्मा) अल रहमान (वह कृपालु) अल रहीम (वह दयालु) अल अव्वल (वही पहला है) वल आखिर (वही अंतिम है) वल जाहिर (वही व्यक्त है) वल कतिन् (वही अव्यक्त है)’’ जैसे सूत्रों का उपयोग कर सकते हैं। 
प्रज्ञायोग व्यायाम- को करते समय भी व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार किन्हीं मंत्रों या नामों का उपयोग कर सकते हैं। 

प्राणायाम : प्राणायाम में श्वास को लयबद्ध रखा जाता है। उसके लिए ॐ या किसी नाम का उपयोग किया जाता है। ॐकार को परमात्मा का ध्वनि रूप (नाद ब्रह्म) माना गया है। वह नाम- रूप से परे है, इसलिए किसी भी मत वाले उसका प्रयोग कर सकते हैं। फिर भी यदि किसी को संकोच हो तो वे अपने विश्वास के अनुसार किसी लयबद्ध ध्वनि (आमीन आदि) को उपयोग कर सकते हैं। 

इस प्रकार आस्थानुसार मंत्र या ध्वनि- ध्यान की छूट देने से साधकों के अंदर अज्ञानवश उभरने वाले संकोच हटेंगे। जब यौगिक क्रियाओं को लोग सहज भाव से करने लगेंगे, तो साम्प्रदायिक समरसता अपने आप बढ़ेगी। विश्वमानव को एकता- समता के रास्ते विश्व बंधुत्व की दिशा में गति दी जा सकेगी।

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