Published on 2000-00-00
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जोरहाट (आसाम)

जादव पयेंग उन दिनों एक किशोर था, जब उसने अनुभव किया कि ब्रह्मपुत्र में आयी बाढ़ में बह गये जंगलों के कारण प्रवासी पक्षियों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही थी। वन्यजीव भी कम हो रहे थे। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ में बहती मिट्टी के साथ बहते मरे हुए साँप और अन्य जीव भी उसने देखे थ। पयेंग ने गाँववालों से घटते जंगलों से पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभावों की जानकारी भी ली। 

३४ वर्ष पूर्व १९७९ में पयेंग की पीड़ा ने उसके मन में पर्यावरण-प्रेम को जन्म दिया। तब उसने अपने घर से कुछ किलोमीटर दूर ब्रह्मपुत्र के तट पर खाली पड़ी एक भूमि को चुना। अकेले ही वहाँ  बाँस के पेड़ लगाने आरंभ किये। वह प्रतिदिन पेड़-पौधे लगाता रहा और उनकी देखभाल करता रहा। 

जैसे-जैसे हरियाली बढऩे लगी, प्रवासी पक्षी और जीव-जंतुओं की संख्या भी बढऩे लगी जिससे उसका उत्साह भी बढ़ता गया। उसके एकाकी प्रयास से आज ५५० हेक्टेअर भूमि हरेभरे जंगल में बदल गयी है। यह जंगल आज पशु-पक्षी ही नहीं हाथी, शेर-चीते, दरियाई घोड़ा, हिरनों के झुंडों का भी बसेरा है। जादव पयेंग का पुरुषार्थ यहाँ भी नहीं थमा, वह इन दिनों उसी जंगल के पास की १५० एकड़ वीरान पड़ी भूमि को हराभरा बनाने में जुटा है। 

पहले १५-२० साल तक तो पयेंग ने बाँस और सामान्य से जंगली पौधे ही लगाये। उसके बाद उसने टीक जैसे कीमती पेड़ लगाना आरंभ किया। आरंभ में पौधों की सिचाई करना आसान न था। उसने बाँस के नये पाँधों के ऊपर बाँस की छोटी-छोटी मचान बनाकर उन पर मिट्टी के बर्तन में पानी भर ऐसी व्यवस्था बनायी, जिससे एक सप्ताह तक उन्हें पानी मिलता रहे। पयेंग बताते हैं कि दीमक और चींटी और केंचुओं ने भूमि को ऊर्वरा बनाने में बहुत मदद की। इससे पौधों का विकास होता गया। 

जंगल बढऩे लगा तो वहाँ हाथी और अन्य जानवर आने लगे। ये हाथी गाँवों में भी घुस जाते जिससे गाँववालों का विरोध झेलना पड़ा। इस समस्या के समाधान का उपाय भी उसने ही ढूँढ़ा। उसने जंगल में केले के पेड़ लगाने आरंभ कर दिये। केला हाथी का प्रिय भोजन है। पर्याप्त भोजन मिलने लगा तो हाथियों ने गाँवों की ओर जाना बंद कर दिया। जंगल में हिरन और अन्य जानवर भी खूब बढऩे लगे, जिससे वहाँ बसने वाले शेर-चीतों को भी भोजन की कमी नहीं होती थी। इससे गाँववाले निर्भीक होकर रह सकते थे। 

जादव पयेंग ने ५० दुधारू जानवर पाल रखे हैं। वह दूध बेचकर परिवार का पोषण करता है और बढ़ती हरियाली, जीव-जंतुओं की खुशहाली को ही ईश्वर की आराधना मानते हुए अनंत सुख-संतोष की अनुभूति करता है। 

  • जादव पयेंग का पर्यावरण प्रेम और उसके  एकाकी प्रयास के परिणाम अद्भुत हैं, सारे समाज के लिए प्रेरणादायी हैं। असम सरकार ने उनके सम्मान में उनके लगाये ५५० हैक्टेअर वन का नाम 'मुलई कथोनी बारी' रखा है। 'मुलई' जादव पयेंग का मुँह बोला नाम है। 
  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली ने जादव पयेंग को 'फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया' की उपाधि दी है। 
  • डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति ने जादव पयेंग के काम की भरपूर सराहना की है। 
  • ख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं-''पयेंग सच्चा वन संरक्षक है जो पूरी मेहनत और ईमानदारी से यह कार्य कर रहा है। उसने बताया है कि एक सामान्य व्यक्ति अपने पवित्र ध्येय और संकल्पशक्ति के सहारे क्या कर सकता है!''


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