हर व्यक्त‌ि इन बातों को समझे तो व‌िश्व में शांत‌ि और सद्भाव संभव है

Published on 2015-09-21
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एकता की स्थापना के लिए समता आवश्यक है

21 स‌ितंबर को व‌‌िश्व शांत‌ि द‌िवस के रुप में मनाया जाता है क्योंक‌ि मानव के व‌िकास और उन्नत‌ि के ल‌िए शांत‌ि सबसे जरुरी तत्व है। लेक‌‌िन साल में स‌‌िर्फ एक द‌िन को शांत‌ि द‌िवस के रुप में मनाने भर से यह उद्देश्य पूरा नहीं होता है।

समाज में द‌िन ब द‌िन असंतोष, व‌िषमता और द्वेष की भावना बढ़ती जा रही है और यह शांत‌ि को भंग करने काम कर रही है। आये द‌िन व‌िद्रोही गुट, आतंकी गुटों का जन्म हो रहा है और व‌िश्व के समाने में शांत‌ि एक चुनौती बनती जा रही है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना है क‌ि दुन‌िया में शांत‌ि स्‍थापना के ल‌िए अगल से कुछ करने की जरुरत नहीं है हमे बस अपने अंदर झाकने की जरुरत भर है। वास्तव में दुनिया में शान्ति की स्थापना के लिए एकता और समता की आवश्यकता है। एकता की स्थापना के लिए समता आवश्यक है।

एक समर्थ, दूसरा असमर्थ रहे, तो समर्थ अहंकारिता प्रदर्शन के लिए अपहरण का प्रयास करेगा। जो असमर्थ है, वह अपने साथ अनीतिपूर्ण भेदभाव बरते जाने से निरंतर असंतुष्ट रहेगा। ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध के लिए जो कुछ भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हो सके करने से चूकेगा नहीं।


अशांत‌ि का प्रधान कारण यही है

अशांत‌ि का प्रधान कारण यही है। कारण के रहते न समस्या का न‌िदान नहीं हो सकता। रक्त में विष घुला हुआ हो, तो कोई न कोई रोग उभरता ही रहेगा। एक का उपचार करते -करते सफलता के कुछ लक्षण द‌िखे नहीं कि नई बीमारी, नए रूप में सामने आ जाएगी।

हर पत्ते सींचने पर परिश्रम करने की अपेक्षा जड़ में पानी देना चाहिए। शांत‌ि और स्थिरता के लिये एकता और समता की सोचनी चाहिए।

समता का अर्थ साम्य सबसे प्रबल और प्रमुख है। साम्यवाद में इसी पर जोर दिया गया है। हर व्यक्ति योग्यता के अनुसार काम करे और आवश्यकता के अनुरूप लेता रहे। बचत राष्ट्रकोष में जमा हो। उसे व्यक्ति विशेष के अधिकार में रहने देने से अहंकार बढ़ेगा और दुर्व्यसनों की भरमार होगी। पूँजी राज्य कोष में जमा रहने से उसके द्वारा जनहित के महत्वपूर्ण कार्य किए जा सकेंगे। उन उपलब्धियों का लाभ समूचे समुदाय को मिलेगा। यही पारिवारिकता है, परिवार में यही होता है।

तो बस हर जगह होगी शंत‌ि

समर्थ, सामर्थ्य भर काम करते हैं और आवश्यकता के अनुरूप लेते है। बचत पूंजी गृहपति के पास जमा रहती है और जब भी परिवार के हित में उसकी आवश्यकता होती है, तभी खर्च कर लिया जाता है। यदि इसमें व्यतिरेक हो, कोई सदस्य अपने लिये अधिक लें और मनमाना अखरने वाला खर्च करें, तो समझना चाहिए कि उस असमानता के कारण एकता नष्ट होगी, कलह मचेगा और परिवार बिखर कर रहेगा। इसी सिद्धान्त को बढ़े रूप में राष्ट्र के व्यापक क्षेत्र में कार्यान्वित करने का नाम साम्यवाद है। इस समूचे साम्यवाद का अर्थ परक एक छोटा अंश कहना चाहिए।

आध्यात्मिक साम्यवाद में अर्थ वितरण का पूरा पूरा निर्देशन है। कहा गया है कि औसत देशवासी स्तर का निर्वाह हर ईमानदार व्यक्ति को स्वेच्छापूर्वक अपनाना चाहिए। एक को मलाई, दूसरे को चटनी, ऐसा भेदभाव नहीं चलना चाहिए, अन्यथा विद्वेष की आग भड़केगी और भलाई वाला अपेक्षाकृत अधिक घाटे में रहेगा।

योग्यता और क्षमता के अनुरुप भरसक काम करने के उपरान्त, जो बचत पूंजी हो, उसे पिछड़ों को बढ़ाने, गिरों को उठाने में हाथों हाथ खर्च कर देना चाहिए। संपदा व्यक्ति विशेष के स्वामित्व में संग्रहीत नहीं करनी चाहिए। कबीर का एक प्रसिद्ध दोहा इस नीति का अच्छा स्पस्टीकरण है-
पानी बाढ्यो नाव में, घर में बाढ़्यो दाम ।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।।

उलीचने से तात्पर्य सम्यक् वितरण से है। दुर्व्यसनों में, कुपात्रों में उसे अपव्यय करना नहीं। इस तरह का सम्यक् वितरण जहां भी रहेगा वहाँ समता के साथ एकता भी बनी रहेगी और इस अनुबंध का पालन करने वाला समुदाय सुख शान्ति से रहेगा।


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