Published on 2017-02-06
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मन वस्तुत: एक बड़ी शक्ति है। आलसी और  उत्साही, कायर और वीर, दानी और समृद्ध, निर्गुणी और सद्गुणी, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश-पाताल का अंतर मनुष्य के बीच दिखाई पड़ता है, उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती हैं, पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है, पचानवें प्रतिशत कारण मानसिक। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी से बुरी स्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है, मान-सम्मान और सुविधाएँ प्राप्त कर सकता है। पर जिनकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है, जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है, उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायेगी।

अध्यात्म आदर्श के प्रतीक-शिव
• कैलाश-ज्ञान का, आदर्शों का शिखर
• श्मशान-भौतिकता से वैराग्य
• गोल पिण्डी-ज्ञानी की दृष्टि संसार से परे आत्मा पर रहती है
• मस्तक पर चंद्रमा-मुदित मन, संसार की विषमताओं का कोई प्रभाव नहीं
• तीसरा नेत्र-विवेक की दृष्टि
• विषपान-परमार्थी दूसरों के हित के लिए विषपान करने, कष्ट सहने से कतराते नहीं, उसका प्रभाव भी नहीं होता।
• भस्म रमाना-संयम से स्वास्थ्य संवर्धन-बाहरी अलंकार जरूरी नहीं
• प्रेत, पिशाच, सर्प-दुश्मन कोई नहीं, प्रेम से सभी अपने बन जाते हैं।

मन-विचारों का प्रभाव
कर्म जो आँखों से दिखाई देता है, वह अदृश्य विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही करता है। चोरी, ईमानदारी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी, कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता। उसके मन में इस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वह कार्यरूप में परिणत हो गए। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतशील एवं सफलता संपन्न दिखाई पड़ते हैं, वे अचानक ही वैसे नहीं बन गए होते, वरन चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उन्होंने बहुत पहले जगा लिया होता है। उन्होंने अपने मन:क्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं, जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है।

तात्पर्य केवल इतना ही है कि मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है, जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।

मन की साधना
शरीर को आलस्य, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा हुआ रहने दिया जाए तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जाएँगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाए, उसे कुसंस्कार ग्रस्त होने से सँभाला न जाए तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते हैं, तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है। यदि उसे रोका, सँभाला, समझाया बाँधा और उठाया न जाए तो उसका कुसंस्कारी, दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन-दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है।

आज इसी प्रकार का अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैलती दिखाई देती है, वैसे ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलहप्रिय, क्रोधी, तुनकमिजाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दंड प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन-दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन-दिन दूर पड़ता जाता है। प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर प्रेमभाव कितना बढे़, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाए।

मलिनता मिटे, मन स्वच्छ बने
नैतिक आदर्शों का पालन शरीर के प्रतिबंधों पर नहीं, मन की उच्च स्थिति पर निर्भर है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी षड्रिपु, जो मन में छिपे बैठे रहते हैं, समय-समय पर हिंसा, झूठ, पाखंड, स्वार्थ, बेईमानी, रिश्वतखोरी, दहेज, कन्या-विक्रय, वर-विक्रय, मांसाहार, जुआ, चोरी आदि सामाजिक बुराइयों के रूप में फूट पड़ते हैं। नाना प्रकार के दुष्कर्म यद्यपि अलग-अलग प्रकार के दिख पड़ते हैं, पर उनका मूल एक ही है-मन की मलिनता। जिस प्रकार पेट खराब होने से नाना प्रकार के शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार मन मलिन होने पर हमारे वैयक्तिक और आंतरिक जीवन में नाना प्रकार के कुकर्म बन पड़ते हैं। जिस प्रकार रोगों के कारण शरीर को पीड़ा उठानी पड़ती है, उसी प्रकार मन की मलीनता से हमारा सारा बौद्धिक संस्थान, विचार क्षेत्र औंधा हो जाता है और कार्यशैली ऐसी ओछी बन पड़ती है कि पग-पग पर असफलता, चिंता, त्रास, शोक, विक्षोभ के अवसर उपस्थित होने लगते हैं। अव्यवस्थित मनोभूमि को लेकर इस संसार में न तो कोई महान बना है और न किसी ने जीवन को सफल बनाया है। उसके लिए क्लेश और कलह, शोक और संताप, दैन्य और दरिद्रता ही सुनिश्चित हैं। न्यूनाधिक मात्रा में वही उसे मिलने हैं, वही मिलते भी रहते हैं।

हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान-पुण्य, कथा-कीर्तन सभी का महत्व है, पर उनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलता है, जिन्होंने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गंदी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो, तो भजन-पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अंतरात्मा की निर्मलता अपने आप में एक साधन है, जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी उन्हें आत्म-दर्शन का, मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धिदायिनी बन जाती है।

‘सुमनस्’ शब्द संस्कृत भाषा में एक बहुत ही प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता का प्रतीक है। जिसका मन स्वच्छ होता है उसे सुमानस् कहकर सम्मानित किया जाता है। ऋषि लोग प्रसन्न होकर किसी को ‘सौमनस्’ अर्थात् सुंदर मन वाला होने का आशीर्वाद दिया करते थे। स्वच्छ मन वाले महामानवों का देव समाज जहाँ बढ़ता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। स्थान चाहे पृथ्वी हो या कोई और लोक, स्वर्ग वहीं रहेगा जहाँ ऊँचे मन वाले मनुष्य रहेंगे।

राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति
किसी राष्ट्र की दौलत सोना-चाँदी नहीं, वरन वहाँ की उच्च मन वाली जनता ही है। श्रेष्ठ मनुष्य का मूल्य सोने और चाँदी के पहाड़ से अधिक है। गाँधी और बुद्ध की कीमत रुपए में नहीं आँकी जा सकती।

वैयक्तिक और सामूहिक दोनों ही दृष्टियों से जनमानस की स्वच्छता एवं उत्कृष्टता नितांत आवश्यक है। इसके बिना न तो कोई मनुष्य व्यक्तिगत रूप से सुखी रह सकेगा और न समाज ही समुन्नत हो सकेगा। आमदनी और सुविधाएँ बढ़ाने वाली योजनाएँ भी तब तक कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध न होंगी, जब तक अंत:करण का स्तर ऊँचा न उठे।

साँप को दूध पिलाने से साँप का विष बढ़ता है। उसी प्रकार धन, बल और साधना बढ़ जाने से दुष्ट मनुष्य की दुष्टता और अधिक बढ़ जाती है। इसलिए राजकोषीय योजनाएँ जो भी हों, हमारी आध्यात्मिक योजनाएँ यही होनीं चाहिए कि मनुष्य का मन ऊँचा उठे, शुद्ध हो, उत्कृष्टता एवं सद्गुणों से परिपूर्ण हो, उन्नति करे। यही योजना सच्ची योजना हो सकती है और इस में सफलता मिलने पर ही सुख-साधन बढ़ाने वाली योजनाएँ उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।


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