नवसृजन के अभियान में अपनी भूमिका समझे- निभाये नारी

Published on 2016-09-08
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नवजागरण की दिशा में नारी को बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। उसे लम्बे समय तक बन्धनों में जकड़े रहने से पैदा हुए अपने पिछड़ेपन से मुक्ति पाकर अपनी योग्यता और क्षमता को विकसित करना होगा और नये निर्माण की भूमिका बनाने में भी हाथ बँटाना होगा। अपने विकास के लिए स्वयं अपने आप से संघर्ष करना होगा तथा मार्ग में रुकावट डालने वाली परिवार और समाज में फैली रूढ़ियों से भी निपटना पड़ेगा।

यह सब कठिन अवश्य है, लेकिन नारी इसे अवश्य कर लेगी। महाकाल ने उसे जो कार्य सौंपा है, उसे अपनी जन्मजात दैवी क्षमताओं के सहारे वह निश्चित रूप से पूरा कर सकती है।

सुधारात्मक प्रयास अविलम्ब आरंभ हों
यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि नारी परिवार या समाज के निर्माण में तभी हाथ बँटा सकेगी, जब पहले आत्म- निर्माण का कार्य पूरा कर लेगी। उसे आत्म- विकास के साथ सुधार- कार्य भी किसी न किसी रूप में हाथ में लेने ही चाहिए। अपने ही घरों में उसे छोटे से छोटा, किन्तु सुनिश्चित क्रम तो प्रारम्भ कर ही देना चाहिए। छोटे- छोटे परिवर्तन भविष्य के बड़े सुधार कार्यो के लिए प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकते हैं।

भेदभाव मिटे : घरों में लड़के और लड़कियों के बीच बरता जाने वाला भेदभाव तुरन्त समाप्त किया जाना चाहिए। लिंग- भेद के कारण किसी को न तो सम्मान मिले न तिरस्कार। न तो लड़के- लड़कियों को छोटी नजर से देखें न लड़कियाँ अपने को हीन अनुभव करें। उनके भोजन, शिक्षा- दीक्षा, दुलार, सम्मान आदि में किसी प्रकार का अन्तर नहीं होना चाहिए। लड़के कमाई खिलाते और वंश चलाते हैं, लड़कियाँ पराये घर का कूड़ा- कर्जे की डिग्री होती हैं, ऐसी बुद्धि रखकर बच्चों में भेदभाव करना यही बताता है कि यह लोग अभिभावक कहलाने तक के अधिकारी नहीं, सहज वात्सल्य का इनमें उदय नहीं हुआ है। हमें इस प्रकार के भेदभाव को अपने मनों से पूरी तरह निकाल ही फेंकना चाहिए।

पुत्र- जन्म की खुशी और कन्या जन्म पर रंज मनाया जाना मनुष्यता की शान पर बट्टा लगाता है। नर और नारी की असमानता मिटाने का आरम्भ यहीं से होना चाहिए। महिलाएँ बच्चों के बीच बरते जाने वाले इस भेद- भाव का अन्त स्वयं करेंगी तो ही पुरुषों को उस परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होगी।

व्यवहार में समानता हो : पर्दा- प्रथा का अन्त होना ही चाहिए। यह कार्य स्त्रियाँ स्वतः करें। सास अपनी पुत्रवधू को बेटी कहकर सम्बोधित करें और बतायें कि अन्य बच्चों की तरह वह भी इस परिवार की सदस्य है। बाहर के दुष्ट- दुराचारियों से पर्दा करने की कुछ उपयोगिता भी हो सकती है, परन्तु अपने ही आत्मीयजनों के साथ विरानेपन का अनुभव करना व्यर्थ है। इसी घर में पैदा हुए लोगों की ही तरह उसे भी घुल- मिलकर हँसते- हँसाते वातावरण में रहना चाहिए। बड़ों के सामने सिर ढकने जैसे सामान्य शिष्टाचार बरतने में हर्ज नहीं, पर उतना बड़ा घूँघट निरर्थक है, जिसके कारण परस्पर वार्तालाप तक पर प्रतिबन्ध लग जाय।

गहने पहनना घातक है : जेवरों की अनुपयोगिता स्पष्ट है। उसमें व्यर्थ ही पैसा रुकता है। धातुओं में मिलावट, टाँका, बट्टा, मीना तथा गढ़ाई, कमाई, बनाई, टूट- फूट के कारण उनमें लगे धन की कीमत आधी भी नहीं उठती। चोरी, हत्या, ईष्या, अहंकार, उद्धत प्रदर्शन, प्रतिस्पर्द्धा जैसी कितनी ही हानियाँ हैं जो जेवरों के कारण आये दिन होती रहती है।

सोना, चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुएँ राष्ट्रीय कोष में संग्रहीत न रहकर जब घरों में बिखर जाती हैं तो उसका प्रभाव देश की अर्थ- व्यवस्था पर पड़ता है। जिन अंगों पर जेवर लदे रहते हैं उनकी त्वचा कड़ी पड़ जाती है, पसीना रुकता है और कुरूपता तथा रुग्णता उत्पन्न होती है। नाक और कान में सूराख करके जेवर पहनना तो किसी असभ्य काल में प्रचलित हुई रूढ़ि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

फैशन से बचें, सादगी अपनायें : फैशन के नाम पर खर्चीला भौंड़ापन आजकल बढ़ता चला जा रहा है। अमीरों, शिक्षितों और शौकीनों की नकल अब गरीब लोग भी करने को मचलते हैं। इससे पैसा और समय तो बर्बाद होता ही है, अवांछनीय सज- धज से शृंगारिक अश्लीलता बढ़ती है और चरित्रों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सादगी, शालीनता और सज्जनता हमारी नीति होनी चाहिए। अनावश्यक सजधज के प्रति भारतीय परिवारों में अनुत्साह रहना ही अपनी संस्कृति के अनुरूप है।

आध्यात्मिकता बढ़े : घरों में आस्तिकता का, आध्यात्मिकता का और धार्मिकता का वातावरण बनाना चाहिए। नास्तिकता मनुष्य को उच्छृंखल और मर्यादाहीन बना देती है। कर्मफल, परलोक, ईश्वरीय नियंत्रण आदि को स्वीकार न करने के कारण यह मनोवृत्ति अवसर आने पर कुछ भी क्रूर कर्म करने के लिए तैयार हो सकती है। मनुष्य को पशु और पिशाच बनने से रोकने में सच्चे ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई आत्मानुशासन नहीं हो सकता।


जननी ही नहीं, निर्मात्री भी है नारी
यदि नारी केवल जन्म देने वाली रही होती, तो उसे जननी भर कहा जाता। अपने से सम्बन्धित लोगों के व्यक्तित्व का ठीक- ठीक निर्माण कर सकने की क्षमता होने के कारण ही उसे निर्मात्री कहा गया है। जनमानस के भावनात्मक नव- निर्माण का उत्तरदायित्व नारी के कंधे पर ही महाकाल ने सौंपने का निश्चय किया है। उसमें उसकी ईश्वर प्रदत्त विशिष्टता ही मुख्य कारण है। नारी में वे सभी गुण हैं जिनमें वह अपनी संतान का, परिवार का, मनुष्यों का निर्माण कर सकती है।

छोटे- छोटे कुटुम्ब भी वास्तव में अपने आप में एक समाज, राष्ट्र अथवा संघ संगठन हैं। राष्ट्रों की अपनी समस्याएँ और अपनी आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें पूरा करने के लिए जैसे कुछ सोचना और करना पड़ता है, छोटे रूप में लगभग वैसा ही परिवार के लिए आवश्यक हो जाता है। परिवार निर्माण की समूची रूपरेखा एकबारगी मस्तिष्क में बिठानी पड़ती है और उसे पूरा करने के लिए अपने आपको एक प्रकार से होम ही कर देना पड़ता है। समर्पण की देवी- नारी ही यह सब कर सकती है। पति इस समर्पण का प्रतीक भर होता है, वस्तुतः नारी को नवनिर्माण तो सारे परिवार का करना पड़ता है।

यह महान उत्तरदायित्व पूरा करने के लिए नारी को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलम्बन इन तीनों ही मोर्चों पर आगे बढ़ना है। उसे व्यक्तिगत जीवन में घुसे हुए आलस्य और अवसाद को छोड़ना होगा और प्रगति के लिए अवकाश एवं साधन प्राप्त करने होंगे। यह देखना होगा कि वर्तमान की अस्त- व्यस्तताओं को किस प्रकार कितनी मात्रा में सुधारा जा सकता है। प्रचण्ड उत्साह, प्रबल पुरुषार्थ और परिष्कृत दृष्टिकोण ही वे हथियार हैं, जिनके उपयोग से आत्मोत्कर्ष की सम्भावना फलित हो सकती है।

शिक्षा का अभियान : शिक्षा और स्वावलम्बन की दिशा में नई उमंगें उठनी चाहिए। अध्ययन का शौक उत्पन्न किया जाये। बिना पढ़ी प्रौढ़ महिलाएँ पढ़ना आरम्भ करें, पढ़ी आगे का अध्ययन जारी रखें। आवश्यक नहीं कि यह पढ़ाई स्कूली परीक्षा उत्तीर्ण करने की दृष्टि से ही हो। उपयोगी ज्ञान बढ़ाना ही अपनी शिक्षा का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।

दहेज, दिखावा बंद हो : निर्माण के साथ- साथ अनीति उन्मूलन के मोर्चे पर भी नारी को सक्रिय होना पड़ेगा। कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं और अन्धविश्वासों ने नारी जाति को असीम क्षति पहुँचाई है। उन्हें एक- एक करके उखाड़ने की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। छोटी उम्र में बच्चों का विवाह कर देना बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है। कम उमर के लड़के- लड़कियों का विवाह करके उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट कर देने वाली भूल अब बिल्कुल बन्द हो जानी चाहिए।

विवाह- शादियों में पागलों की तरह की जाने धूम- धाम और पैसे की जलाई जाने वाली होली की कोई उपयोगिता नहीं। दहेज का लेन- देन माँस की खरीद- फरोख्त से भी अधिक घिनौना है। इस कुप्रथा के कारण अपने समाज में गरीबी और बेईमानी का कुचक्र चल रहा है। दो कुटुम्बों को एक सूत्र में बाँधने के स्थान पर दहेज उन्हें शत्रुता जैसी स्थिति में ला पटकता है। सुयोग्य लड़कियों को उपयुक्त लड़के नहीं मिल पाते और न जाने कितने घिनौने अनर्थ इस पिशाचिनी दहेज प्रथा के कारण होते हैं। समय आ गया कि इस प्रथा का अन्त कर दिया जाए और नितान्त सादगी के साथ कम खर्च की शादियाँ होने लगें।

कुरीतियाँ- अंधविश्वास मिटायें : वंश और वेश के नाम पर लाखों की संख्या में लोग दान- दक्षिणा बटोरने एवं भिक्षा माँगने का व्यवसाय करें, यह सचमुच ही अनर्थ है। इससे मनुष्यता का गौरव गिरता है और कर्महीन लोगों के व्यय भार से निर्धन देश की कमर टूटती है। दान तो केवल शरीर से अपंगों को अथवा समाज की प्रगति के लिए ही दिया जाना चाहिए। हर माँगने वाले को बिना समझे दे देना पुण्य का नहीं पाप का रास्ता है। मृतक भोज, भूत- पलीत, टोना- टोटका, ज्योतिष, मुहूर्त जैसे भ्रम जंजाल में समय, धन और संन्तुलन गँवाने से लाभ रत्ती भर भी नहीं, हानि अपार है। देवी- देवताओं के नाम पर पशु- बलि और नर- बलि के जो कुकर्म देखने को मिलते हैं उन्हें लज्जाजनक मूढ़- मान्यता के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

इस प्रकार न चलने योग्य ढेरों अन्य परम्पराएँ बहुत करके नारी समाज का सहारा पाकर ही जीवित हैं। उन्हें समाप्त करने के लिए उसे ही अपना विवेक जाग्रत् करना होगा। साहसपूर्वक इन हानिकारक अवांछनीयताओं से अपना पीछा छुड़ाना होगा।

संघबद्ध हों, साहसिक कदम बढ़ायें:
एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखने की यह है कि नारी उत्कर्ष जैसा महान अभियान संगठित रूप में ही चल सकता है। इतने बड़े परिवर्तन के लिए अकेले प्रयत्नों से काम नहीं चलेगा। सौ- दो सौ परिवार सुधर जायें, इससे कुछ बनता- बिगड़ता नहीं। परिवर्तन तो व्यापक रूप से ही होना चाहिए। नारी जागरण की इस पुण्य बेला में प्रत्येक भावनाशील महिला को सक्रिय होना चाहिए।

अभीष्ट परिवर्तन का एक पक्ष है- संघर्ष, दूसरा है- सृजन। हमें इन दोनों ही मोर्चों पर अपने वर्चस्व का परिचय देना चाहिए। इस साहस के सहारे ही नारी का अपने तथा समूची मानवता के उज्ज्वल भविष्य का नव- निर्माण करना सम्भव हो सकेगा।
वाङ्मय ‘इक्कीसवीं सदी- नारी सदी’
पृष्ठ ५.३४- ३९ से संकलित- संपादित


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