उच्च आदर्शों के लिए यज्ञीय परंपरा का निर्वहन आवश्यक : डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी

Published on 2016-10-05

आतंकी गतिविधियों को निरस्त करने हेतु विशेष हवन प्रारंभ, लाखों साधक जुटे

हरिद्वार, ०५ अक्टूबर।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्याजी ने कहा कि प्रकृति यज्ञीय परंपरा का निर्वहन करती है और जब कभी इन नियमों का उल्लंघन हुआ, समस्याएँ खड़ी हुईं। वे शांतिकुंज के मुख्य सभागार में यज्ञ के ज्ञान-विज्ञान विषय पर नवरात्र साधना करने आये साधकों को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषि मुनि जो यज्ञीय परंपरा- संगतिकरण, देवपूजन एवं दान का अनुपालन करते हुए अनुशासन बनाये थे, उससे ही उच्च आदर्श स्थापित हुआ था। उन्होंने कहा कि यज्ञीय परंपरा एवं आदर्शों का पालन करते हुए मानव से महामानव, नर से नारायण बना सकता है। उन्होंने कहा कि यज्ञाग्नि की तरह अपने अंदर की बुराई को जलाने वाली गर्मी, उर्ध्वगमन एवं प्रकाश फैलाने वाले गुणों को साधकों को अपनाना चाहिए। उन्होंने महामानवों के जीवन का उल्लेख करते हुए यज्ञ की महत्ता को वैज्ञानिक दृष्टि से विस्तार से समझाया।

प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मयजी ने कहा कि नवरात्र साधना देवी शक्ति की साधना का सर्वोत्तम अवसर है। साधना में मातृशक्ति के गुणों-दया, करुणा, उदारता आदि को आत्मसात करने की साधना करनी चाहिए जिससे आज के भटके मानव को सही दिशा मिले। इस अवसर पर शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं, देश के कोने-कोने से आये गायत्री साधक उपस्थित थे।

इससे पूर्व भारत की संप्रभुता में खलल डालने वाली आसुरी वृत्ति व आतंकवादी गतिविधियों को निरस्त करने हेतु अखिल विश्व गायत्री परिवार ने आध्यात्मिक उपचार करना प्रारंभ किया है। इसके अंतर्गत गायत्री महामंत्र में विशेष बीजमंत्र का सम्पुट के साथ सामूहिक जप व २७ कुण्डीय यज्ञशाला में आहुतियाँ दी जा रही हैं जिसमें शांतिकुंज के अंतेवासी कार्यकर्त्ता भाई-बहिन एवं देश-विदेश से आये हजारों साधक भागीदारी करते हैं।

शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता ने बताया कि देश की सुरक्षा के लिए गायत्री परिवार सदैव अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। गायत्री परिवार के संस्थापक तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने आजादी के समय अपना पूरी शक्ति झोंक दी थी। आज उसी परंपरा को निर्वहन करते हुए गायत्री परिवार के करोड़ों कार्यकर्त्ता समाज व राष्ट्र निर्माण के कार्यों में जुटे हैं।



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