Published on 2017-02-03

वडोदरा और सूरत उपजोन की गोष्ठियों में आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी ने किया मार्गदर्शन
गुजरात को परम पूज्य गुरुदेव ने अपना बड़ा बेटा कहा था। प्रसन्नता की बात है कि वहाँ के कार्यकर्त्ताओं को अपनी सामर्थ्य का जितना बोध है, उसका सदुपयोग करने का उत्साह भी उतना ही है।

इसी उत्साह के साथ २७ जनवरी को वडोदरा में और २८ जनवरी को सूरत में उपजोन स्तरीय संगठनात्मक कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित हुए। इन्हें शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधि आदरणीय श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी एवं पश्चिम जोन प्रभारी शांतिकुंज प्रतिनिधि श्री दिनेश पटेल ने संबोधित किया। उन्होंने क्षेत्र की वर्तमान स्थिति और प्रगति की समीक्षा करते हुए मिशन के सूत्रों को प्रभावशाली ढंग से जन- जन तक पहुँचाने के बहुमूल्य सूत्र दिये।

वडोदरा का सम्मेलन गायत्री शक्तिपीठ, खटम्बा में हुआ। आठ जिलों के ५०० प्रमुख कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। उपजोन संयोजक श्री महेन्द्रभाई पटेल के साथ जिला प्रभारियों ने अपने- अपने जिले की प्रगति और भावी योजनाओं से केन्द्रीय प्रतिनिधियों को अवगत कराया।

सूरत के एसएमसी मल्टीपरपज़ हॉल, सिंगणपुर में सूरत, नवसारी और वलसाड़ जिलों का सम्मेलन हुआ। तीनों जिलों के ५०० कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। उपजोन संयोजक श्री पूनाभाई पटेल एवं जिला प्रभारियों ने प्रगति प्रतिवेदन और भावी योजनाओं की जानकारी दी।

आदरणीय श्री उपाध्याय जी द्वारा बताये गये कुछ सूत्र
प्यार- सहकारयुक्त व्यवहार
साधक- संगठक की ऊँचाई उसके प्यार और सहकार से नापी जा सकती है। प्यार भरे व्यवहार से ही लोगों का सहकार मिलता है। इस प्यार और सहकार के सहारे ही परम पूज्य गुरुदेव ने यह विराट देव परिवार बनाया है। संगठन सशक्तीकरण और मिशन के प्रचार- विस्तार का यह सबसे बड़ा सूत्र है।

कड़वी दवा कितनी भी लाभकारी क्यों न हो, गले उतारने के लिए उस पर मिठास का आवरण चढ़ाना ही पड़ता है। उसी प्रकार सिद्धांत कितने ही उपयोगी क्यों न हों, वे जनमानस द्वारा स्वीकारे तभी जाते हैं जब उनके प्रचारकों का व्यवहार आत्मीयतापूर्ण और अनुकरणीय हो।

उद्देश्य भूलें नहीं
हमारा लक्ष्य है जनजीवन में आदर्शों की स्थापना। आज कार्यक्रमों में जुटने वाली भीड़ को देखकर हम सफलता के अहंकार में फूल जाते हैं और युग निर्माण का असली उद्देश्य भूल जाते हैं। आयोजन करना, भीड़ जुटाना हमारा व्यसन और व्यवसाय बनता जा रहा है। हमें इस भूल को सुधारना होगा। लोगों का जीवन गायत्री और यज्ञमय होता जाये, ऐसी योजनाएँ हमें बनानी चाहिए। गुरुदेव के प्रति हमारा प्यार सच्चा है लेकिन उनके लक्ष्य को पूरा करने का संकल्प अभी कच्चा है। अपनी सक्रियता को सही दिशा देने के लिए तप- साधना करनी होगी।

नयी पीढ़ी को आगे लायें
समय की माँग के अनुरूप मिशन को बढ़ाने के लिए युवाओं को जोड़ने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह कार्य कठिन नहीं है। आज का युवा जीवन में अध्यात्म की उपयोगिता को समझने लगा है। उसे यदि माँ का स्नेह और पिता का धैर्ययुक्त मार्गदर्शन मिले तो वह अपनी ही नहीं, सारे समाज की दिशा बदल सकता है।


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