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परमात्मा की विस्मृति को, विस्मरणशीलता को दूर करने का उपासना से अच्छा और कोई उपाय नहीं है। जप- तप, पूजा- अर्चना आदि के जो भी विधान बनाये गये हैं, वे सब परमात्मा को अपने स्मृति पटल पर बनाये रखने के लिए बनाये गये हैं। नित्य प्रति जब नियत समय पर उपासना की जाएगी, तो परमात्मा की स्मृति हृदय पर भली प्रकार अंकित हो जाएगी, जिस प्रकार बार- बार याद करते रहने पर किसी बालक को गिनती अथवा पहाड़ा याद हो जाता है। किसी का संपर्क उसकी याद के लिए सबसे बड़ा कारण है। हमें अपने परिवार और कुटुम्ब के लोग औरों की अपेक्षा अधिक याद क्यों करते हैं? इसलिए कि उनसे हमारा सतत और घनिष्ट संपर्क बना रहता है।
           ठीक इसी प्रकार नियमित रूप से उपासना करते रहने से भगवान् के साथ हमारा संपर्क बढ़ता है। उनसे हम जुड़ते चले जाते हैं। किन्तु इसके साथ- साथ साधना का भी क्रम बनाये रहना चाहिए। क्योंकि जितना महत्त्व उपासना का है, उतना ही साधना का है। हमें उपासना पर ही नहीं, साधना पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत- संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म एवं स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम की जीवन साधना या साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे करनी पड़ती है। अपने हर विचार पर चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है? जहाँ भूल दिखाई दी, उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उसमें लड़ पड़े, यही साधना है। जिस प्रकार सीमारक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और घातों का पता लगाने और जूझने के लिए लेस रहना पड़ता है, वैसी ही जीवन- संग्राम के हर मौके पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है।
            यह सोचना ठीक नहीं कि भजन करने मात्र से पाप कट जायेंगे और ईश्वर प्रसन्न हो जायेंगे, अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अथवा कुमार्गगामिता से बचने की आवश्यकता नहीं, इसी भ्रमपूर्ण मान्यता ने अध्यात्म के लाभों से हमें वंचित रखा है। यह भ्रम दूर हटाया जाना चाहिए और भारतीय अध्यात्म का तत्त्वज्ञान एवं ऋषि- अनुभवों के आधार पर यही निष्कर्ष अपनाना चाहिए कि उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं। दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है, उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योऽन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय और एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
           सच्चे आस्तिक और सच्चे ईश्वर- भक्त का जीवन- क्रम उत्कृष्ट, आदर्शवादी एवं परिष्कृत होना ही चाहिए। नशा पीने पर मस्ती आनी ही चाहिए। भक्ति का प्रभाव सज्जनता और प्रगतिशीलता के रूप में दीखना ही चाहिए। इसलिए हमारा उपासना- क्रम सांगोपांग होना चाहिए और उसमें आत्म- निरीक्षण, आत्म- सुधार, आत्म- निर्माण एवं आत्म- विकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए। उपासना और साधना का स्वतन्त्र अस्तित्व है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जाएगी, यह सोचना उचित नहीं। लाखों साधु- बाबा, पण्डा- पुजारी भजन ध्यान में नित्य घण्टों समय लगाते हैं, पर उनका जीवन प्रायः घृणित एवं निकृष्ट स्तर का बना रहता है।
            इससे स्पष्ट है कि उपासना अपने स्थान पर अपने प्रयोजन के लिए ठीक है, पर वह साधना की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती। यदि कर सकी होती, तो हर भजन करने वाला सच्चरित्र पाया जाता, पर ऐसा होता कहाँ है? इससे स्पष्ट है कि हमें साधना के लिए पृथक् से प्रयत्न करना होगा। जीवन- शोधन और जीवन- विकास की साधना पद्धति को उतना ही, बल्कि उससे भी अधिक महत्त्व देना होगा, जितना कि उपासना को देना है। साधनारहित उपासना विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। किन्तु साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है, जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय, तो बिना उपासना के भी आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्ति हो सकती है।
            ईश्वर की भावनात्मक पूजा की तरह ही सदाचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है। हम निष्पाप बनें, इतना ही पर्याप्त नहीं, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ते हैं और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में सफल होते हैं। अतः हर उपासना प्रेमी को ईश्वर की उपासना के साथ जीवन को उत्कृष्ट बनाने की साधना भी करनी चाहिए, यही सनातन क्रम है और इसी में कल्याण है।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)
(वा.८/९.४२)


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