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महात्मा कबीर जी सहज योग से सहज समाधि को प्रधानता देते हैं। सहज योग का तात्पर्य है- सिद्धान्तमय जीवन, कर्त्तव्यपूर्ण कार्यक्रम। यह समाधि सहज है- सर्व सुलभ है- सर्वसाधारण की साधनाशक्ति के भीतर है, इसलिए उसे ‘सहज समाधि’ का नाम दिया गया है। हठयोग, राजयोग, लययोग, नादयोग, बिन्दुयोग आदि की साधनायें कठिन हैं, उनका अभ्यास करते हुए समाधि की स्थिति तक पहुँचना असाधारण कष्ट साध्य है।
महात्मा कबीर का पद है-
साधो! सहज समाधि भली।
गुरु प्रताप भयो जा दिन से सुरति न अनत चली॥
आँख न मूँदूँ, कान न रूँदूँ, काय कष्ट न धारूँ॥......
           अर्थात् ‘‘हे साधुओ! सहज समाधि श्रेष्ठ है। जिस दिन से गुरु की कृपा हुई है, यह स्थिति प्राप्त हुई है, उस दिन से सुरति दूसरी जगह नहीं गई- चित्त डावाडोल नहीं हुआ। मैं आँख मूँदकर, कान रूँध कर कोई हठयोग की काया- कष्टदायिनी साधना नहीं करता। मैं तो आँखें खोले रहता हूँ और हँस- हँसकर परमात्मा की पुनीत कृति का सुन्दर रूप देखता हूँ। जो कहता हूँ सो नाम जप है। जो सुनता हूँ सो सुमिरन है, जो खाता- पीता हूँ सो पूजा है। घर और जंगल एक सा देखता हूँ और द्वैत का भाव मिटाता हूँ। जहाँ- जहाँ जाता हूँ सोई परमात्मा है और जो कुछ करता हूँ सो सेवा है। जब सोता हूँ तो वही मेरा दंडवत है। मैं एक को छोड़कर अन्य देव को नहीं पूजता। मन मलिन वासना छोड़कर निरन्तर शब्द में, अन्तःकरण की ईश्वरीय वाणी सुनने में रत रहता हूँ। ऐसी तारी लगी है- निष्ठा जमी है कि उठते- बैठते वह कभी नहीं बिसरती। कबीर कहते हैं कि मेरी यह उनमनि- हर्ष, शोक से रहित स्थिति है, जिसे प्रकट करके गाया है। दुःख- सुख से परे जो एक परम सुख है मैं उसमें समा रहा हूँ।’’
             १. सम्पत्ति संचय, २. अहंकार की पूर्ति, ३. मनोरंजन, ४. काम सेवन, ५. रुचिकर आहार- विहार, ६. ममत्व का पोषण, ७. परिग्रह की तृष्णा- इन सात इच्छाओं की आधार धुरी पर घूमने वाले ‘जीवन भोगी’ हैं। जो इस छोटी सीमा में ही घिरे रहते हैं, इसी घेरे में अपने विचार और कार्यों को सीमित रखते हैं वे बन्धनग्रस्त हैं, माया पाश में बँधे हुये हैं। योगी लोग इन शुद्र सीमाओं का उल्लंघन करके आगे बढ़ते हैं, वे इस बचपन से ऊँचे उठकर आध्यात्मिक यौवन की सीमा में पर्दापण करते हैं। भोगमयी क्षुद्रता का योगी लोग उल्लंघन करते हैं। इसलिये उन्हें जीवनमुक्त कहते हैं। योग की आधारशिला यही है। आगे के साधन, अभ्यास भिन्न- भिन्न हैं। उनकी कार्यप्रणाली पृथक- पृथक हैं। इस पृथकता और भिन्नता के होते हुये भी मूल तथ्य सभी साधनाओं के अन्तर्गत एक ही है।
            सहज योग असंख्य प्रकार की योग साधनाओं में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि साधारण रीति में सांसारिक कार्य करते हुये भी साधना क्रम चलता रहता है। इसी बात को यों भी कहना चाहिये कि एक दैनिक जीवन के समान सांसारिक काम ही साधनामय बन जाते हैं। सहज योगी अपने दिन भर के कार्यों को कर्त्तव्य, यज्ञ, धर्म, ईश्वरीय आज्ञा पालन की दृष्टि से करता है। भोजन करने में पवित्र धरोहर शरीर को यथावत् रखने के लिये भोजन किया जा रहा है। खाद्य पदार्थों का चुनाव करते समय शरीर की स्वस्थता उसका ध्येय रहता है, स्वादों के चटोरेपन के बारे में वह सोचता तक नहीं। कुटुम्ब का पालन- पोषण करते समय वह परमात्मा की एक सुरम्य वाटिका के माली की भाँति सिंचन, संवर्धन का ध्यान रखता है, कुटुम्बियों को अपनी सम्पत्ति नहीं मानता। जीविकोपार्जन को, ईश्वर प्रदत्त आवश्यकताओं की पूर्ति को एक पुनीत साधना- मात्र समझता है। अमीर बनने के लिये जैसे भी बने वैसे धन- संग्रह करने की तृष्णा उसे नहीं होती। बातचीत करना, चलना- फिरना, खाना- पीना, सोना- जागना, जीविकोपार्जन, प्रेम, द्वेष आदि सभी कार्यों को प्रधानता देते हुए करने से वे समस्त साधारण कामकाज यज्ञ रूप हो जाते हैं।
            सात्विक सिद्धान्तों को जीवन का आधार बना लेने से, उन्हीं के अनुसार विचार और कार्य करने से आत्मा को सत् तत्व में रमण करने का अभ्यास पड़ जाता है। यह अभ्यास जैसे- जैसे परिपक्व होता जाता है, वैसे- वैसे सहज योग का रसास्वादन होने लगता है, उसमें आनन्द आने लगता है। जब अधिक दृढ़ता, श्रद्धा, विश्वास, उत्साह एवं साहस के साथ सत् परायणता में, सिद्धान्त संचालित जीवन में परायण रहता है तो वह उसकी स्थायी वृत्ति बन जाती है, उसे उसी में तन्मयता रहती है। एक दिव्य आवेश- सा छाया रहता है, इस स्थिति को सहज योग की समाधि या सहज समाधि कहा जाता है।
           स्वल्प प्रयास में समाधि का शाश्वत सुख उपलब्ध करने की इच्छा रखने वाले आध्यात्म मार्ग के पथिकों को चाहिए कि वे जीवन का दृष्टिकोण उच्च उद्देश्यों पर अवलम्बित करें। दैनिक कार्यक्रम का सैद्धान्तिक दृष्टि से निर्णय करें। भोग से ऊँचे उठकर योग में आस्था आरोपण करें। इस दिशा में जो जितनी प्रगति करेगा, उसे उतने ही अंशों में समाधि के लोकोत्तर सुख का रसास्वादन होता चलेगा।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)
(वा.७/ ६.३६)


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