किसी मनुष्य के पास दूसरे को देने योग्य यदि कोई सबसे अधिक उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण वस्तु हो सकती है, तो वह प्रेम ही है। यों आर्थिक या बौद्धिक सहायता देकर भी किसी का कुछ उपकार किया जा सकता है, परन्तु उसका लाभ स्वल्पकालीन रहता है, इसलिए उसकी प्रसन्नता भी क्षण भर ही टिकेगी। प्रेम और सद्भाव पाकर आत्मा जितनी प्रसन्नता अनुभव करती है, उतनी और किसी वस्तु से नहीं करती। उपकार करने में जो त्याग करना पड़ता है, उससे कई गुना प्रतिफल तब वसूल हो जाता है, जब जिसके साथ उपकार किया गया था, वह सच्चे हृदय से कृतज्ञता और प्रेम- भावना प्रकट करता है। यह कृतज्ञता और प्रेम- भावना उपकारी को ही प्राप्त हो सकती है। इस संसार में पाप और दुष्टता की तरह प्रेम और सौजन्य भी परिपूर्ण मात्रा में भरा पड़ा है, पर उसे वे लोग प्राप्त नहीं करते जिनका मन कुटिलता और व्यवहार अनीति से भरा हुआ है। सज्जनता, सरलता, सच्चाई और सहृदयता में ही वह गुण है कि सामने वाले पत्थर को भी अपने लिए मक्खन बनाकर रख दे। सच्चा प्रेम प्राप्त करने के लिए सज्जनता की आवश्यकता है। सज्जन व्यक्ति को कई बार चालाक लोग ठग लेते हैं, पर तो भी उसकी उदारता और भलमनसाहत के प्रति उन्हें नतमस्तक होना पड़ता है। ठगाये जाने पर भी जिसने अपनी सज्जनता को नहीं छोड़ा, वह किसी भी बलिदानी वीर से कम प्रशंसनीय नहीं है।
जिसके मन में दूसरों के प्रति कोमल भावनाएँ रहेंगी, वे ही दूसरों का स्नेह और सम्मान प्राप्त कर सकेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि हर व्यक्ति की आत्मा स्नेह, सम्मान और सद्भाव की प्यासी है। यदि वे नकली रूप में भी कहीं दिखाई पड़ते हैं, तो भी उन्हें लुभाने के लिए उतनाही बहुत है। बहेलिये जिस प्रकार दाने डालकर अपना जाल कबूतरों से भर लेते हैं, मछुए जिस प्रकार आटे की गोली खिलाकर मछलियाँ समेटते रहते हैं, उसी प्रकार नकली प्रेम का प्रलोभन देकर कि तने ही ठग दूसरों का सर्वस्व हरण कर लेते हैं। इन हथकण्डों के बीच एक ही सत्य छिपा हुआ है और वह यह कि हर व्यक्ति प्रेम का प्यासा है, हर किसी को सद्व्यवहार और सज्जनता की प्यास है। यह इतना प्रकट तथ्य है कि नकली प्रेम की विडम्बना बनाकर वेश्याओं से लेकर प्रपंची ठगों तक सभी ने नकली मधुरता को अपने लिए एक सफलता का व्यावसायिक अस्त्र बनाया हुआ है।
यह हुई नकलीपन की बात। असली रूप का आनन्द तो इतना उत्कृष्ट है कि उसकी एक बूँद के बदले में मनुष्य अपना सर्वस्व निछावर कर सकता है। प्रेम की प्राप्ति के लिए लोग बड़े से बड़ा त्याग करते हैं। पति- पत्नी के प्रेम सम्बन्ध में तो यह बात स्पष्ट है ही। स्त्री- स्त्री और पुरुष- पुरुष में भी प्रेम भाव की गहनता होने पर एक- दूसरे के लिए मर मिटने के अवसर सहज ही आ सकते हैं। निःसन्देह मनुष्य को अपना धन और प्राण प्रिय हैं, पर प्रेम की महानता इतनी ऊँची है कि उसके लिए इन दोनों को भी सहज ही तिलाञ्जलि दी जा सकती है।
यदि सच्चे स्नेह और सच्चे सद्भाव की कुछ बूँद मनुष्य को मिलती रहे, तो वह रूखी रोटी खाकर और फटे- चिथड़े पहनकर अमीरों और रईसों से अधिक गर्व आनन्द अनुभव करता हुआ जीवन व्यतीत कर सकता है। परिवार के छोटे दायरे में जिसे धर्मपत्नी की अनन्यता, बच्चों की श्रद्धा, भाई का विश्वास, बहिन की ममता, माता का वात्सल्य, पिता का प्रेम, नौकर की वफादारी प्राप्त है, उसे अगणित समस्याएँ सामने रहते हुए भी अपना जीवन स्वर्गीय शान्ति से परिपूर्ण दिखाई देगा। फिर जिसके मित्र, स्वजन, परिजन, परिचित, सम्बन्धी भी यदि ऐसा ही व्यवहार रखने लगें, तो कहना ही क्या? उस जीवन में हर दिशा से आनन्द की निर्झरिणी बहती रहेगी।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स,गायत्री तीर्थ, हरिद्वार)
(वा.८/१२.२५)


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