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सद्भावनाओं का उत्पादन और सम्वर्द्धन करने के लिए जितना उपयोगी और उर्वर क्षेत्र परिवार है, उतना दूसरा और कोई नहीं। सद्भावनाओं का उपयोग देशभक्ति, समाजसेवा, सहकारिता, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, कला आदि किसी भी क्षेत्र में किया जा सकता है, किन्तु उसका मौलिक उत्पादन वहाँ नहीं हो सकता। संस्कारों में समाविष्ट बहादुरी किसी को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित तो कर सकती है, पर ऐसा कठिन है कि किसी कायर प्रकृति के मनुष्य को छावनी में कैद करेक वीर बहादुर बना दिया जाय।
          समाज सेवा के अनेक क्षेत्रों में अनेक व्यक्ति ऐसे कामों में संलग्र दिखाई पड़ते हैं जो निश्चित रूप से लोकोपयोगी होते हैं; किन्तु गहराई से देखने पर पता चलता है कि उनमें संलग्र व्यक्तियों में से कितने ही गुपचुप रूप से ऐसे अनाचार करते रहते हैं जिससे लोककल्याण के आचरण में विनाश और अपव्यय ही पल्ले पड़ता है। होना यह चाहिए था कि लोकसेवा के कार्यों में निरत व्यक्ति उस प्रक्रिया से प्रभावित होते और यदि मूलतः जनसेवी नहीं थे, तो भी उस प्रवाह में बहकर समाज सेवा के रंग में रंग जाते; पर जब ऐसा होता नहीं दिखता, तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य की मौलिक प्रकृति इतनी प्रबल है कि उसका बदलना सामान्य तौर से नहीं, किसी विवशता उत्पन्न करने वाले अत्यधिक दबाव से ही सम्भव है।
          यह तथ्य बताते हैं कि मनुष्य की मौलिक प्रकृति प्रधान है और वह शिक्षण एवं वातावरण से यत्किंचित् ही प्रभावित होती है। उसका वह ढाँचा सबसे अधिक मजबूत होता है जो गर्भावस्था से लेकर दस वर्ष की आयु की अवधि में परिवार की परिधि में रहते हुए उपार्जित किया जाता है। अस्तु, इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि मानवी व्यक्तित्व में सद्भावनाओं का, गतिविधियों में सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना है तो इसके लिए आदर्शवादी कार्यक्रमों में सम्मिलित रहने या रखन से ही काम नहीं चलेगा। यदि ऐसा रहा हो तो तथाकथित नेतागण जो जनसाधारण को आदर्शवादी चिन्तन और कर्तृर्त्व की प्रेरणा देते रहते हैं, अपने निजी जीवन में भी उनका पालन करते। परामर्श एक प्रकार का और आचरण दूसरे प्रकार का यह सिद्ध करता है कि बुद्धि से, वाणी से कुछ भी कहा जा रहा हो, मूल निष्ठा उससे भिन्न है। यह निष्ठा ही असली व्यक्तित्व है और उसके निर्माण में परिवारगत प्रभाव एवं वातावरण की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वस्तुतः उसी का प्रभाव चिरस्थायी होता हौ और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करता है।
          परिवर्तन प्रस्तुत समय की महती आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए चिन्तन और चरित्र को, व्यवस्था और प्रचलन को एक प्रकार से इतना अधिक सुधार परिष्कार करना होगा कि उसे कायाकल्प जैसा कहा जा सके। यह बड़ा काम है। इसके लिए योजनाएँ कहीं से बनें, कुछ भी बनें, उनका आधार खड़ा करना ही होगा। व्यक्ति के अन्तराल में उत्कृष्टता का, आध्यात्मिकता का समावेश ही वह आधार है जिसके आधार पर सृजन की अनेकानेक योजनाओं को फलने- फूलने का अवसर मिलेगा। कहना न होगा कि भाव सम्वेदनाओं को सुसंस्कृत बनाने के लिए घर- परिवारों का स्तर उठाना पड़ेगा। परिवारिकता और शालीनता एक ही तथ्य के दो नाम हैं। इसे ध्यान में रखते हुए हमें इस छोटे किन्तु महान कार्य को सम्पादित करना ही होगा जिसे परिवार निर्माण के नाम से जनसाधारण के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)
(वा.४८/१.४२)


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