मनुष्य की अक्ल का कोई ठिकाना नहीं है। आए दिन वह अनेकों समस्याओं का हल करती रहती है। अणु- परमाणु से लेकर विश्व ब्रह्माण्ड तक उसकी पढ़ाई- लिखाई और सोच के विषय हैं। अमीबा से लेकर डायनासोर तक की गुत्थियों को वह हल कर रही है। लेकिन मुख्य समस्या की ओर ध्यान ही नहीं दे पाती है कि जो बेशकीमती जीवन मिला है, उसका उद्देश्य क्या है और उसका सही उपयोग क्या है?
     यह अक्लमंद आदमी दुनिया भर की जानकारियों को सिर पर लादे फिरता है। बड़ी- बड़ी डिग्रियों को लेकर बैठा है। कई विषयों का जानकार होने का दावा करता है, पर छोटा- सा प्रश्न हल नहीं कर पाता कि हम कौन हैं? यहाँ क्यों आये हैं? हमें क्या करना है? बेहोशी का नशा इस बुरी तरह चढ़ा हुआ है कि हर घड़ी कस्तूरी मृग की तरह बाहर ही खुशबू खोजता फिरता है; किन्तु ध्यान अपनी नाभि की ओर जा ही नहीं पाता। बाहर खोज करते- करते थकाहारा आदमी अपनी असफलता और निराशा के साथ अपने भाग्य का रोना रोता रहता है।
     इसी विषय में एक कहानी है कि एक बार एक गाँव से दस शेखचिल्ली पड़ोस के गाँव में मेला देखने जाते हैं। रास्ते में एक नदी पड़ती थी, जिसे पार करके ही रास्ता आगे बढ़ता था। सभी एक साथ नदी पार किए। उस पार पहुँचने पर उनको शक हुआ कि कहीं कोई साथी नदी में बह तो नहीं गया? अतः गिनती पूरी करने का विचार आया। सभी ने बारी- बारी से गिनती गिनी, पर संख्या हर बार नौ से आगे नहीं बढ़ रही थी। गिनती पूरी होती भी कैसे? गिनने वाले का सारा ध्यान तो बाहर दूसरों को गिनने में था और खुद को भूला बैठा था। सभी दुःखी होकर वहीं सिर पर हाथ धरकर बैठ कर रोने लगे कि अब क्या होगा? घर जायेंगे तो क्या जवाब देंगे? उसी समय एक समझदार राही वहाँ से गुजरा। उनकी व्यथा- कथा सुनकर बात उसकी समझ में आ गई। उसने सभी शेखचिल्लियों को एक लाइन में खड़ा किया और जोर- जोर से थप्पड़ मारकर एक, दो, तीन आदि गिनती गिनने लगा। गिनती दस तक पूरी हुई, तो उन्होंने राहत की साँस ली।
     कुछ ऐसी ही हालात अक्लमंद मूर्खों की है जो दुनिया भर की जानकारी तो बटोरते फिरते हैं, पर अपने बारे में एकदम जीरो हैं, साथ ही और बड़ा जानकार होने का दंभ भरते हुए भाँति- भाँति के भ्रम फैलाते हैं।
     अन्दरूनी गुण ही महानता का सच्चा मापदण्ड है। असली जानकार तो उसे ही कहा जायगा, जो बाहरी जानकारियों के साथ अपने अन्दर को जाने व अपने गुणों के विकास पर भी ध्यान देता हो। क्योंकि मनुष्य के जीवन में जितनी भी कठिनाइयाँ और दिक्कतें आती हैं, वे उसके अन्दर छिपे हुए दोष- दुर्गुणों के कारण ही होती हैं। जितना हम अन्दर अच्छे गुणों का विकास करते जाते हैं, उतने ही दुर्गुण कम होते जाते हैं और जिन्दगी भी अधिक सरल, सीधी और हल्की- फुल्की होने लगती है। अन्दरूनी गुणों के कारण ही मनुष्य महान बनता है। जिसमें जितने अधिक सद्गुण होंगे, वह उतना ही बड़ा माना जाएगा। दुनिया के सारे ठाट- बाट, वैभव- विलास और रौब- दाब उसके सामने हल्के पड़ जाते हैं। ये सब तो कुछ समय तक महानता या बड़प्पन दिखाकर नष्ट हो जाते हैं।
     मनुष्य शरीर से कितना ही ताकतवर हो जाए, बुद्धि के बल पर कितना ही बड़ा जानकार या विद्वान् बन जाय और धर्मशास्त्रों का पण्डित बनता फिरे, किन्तु यदि उसके अंदर अच्छे गुणों की कमाई नहीं है, तो उसका व्यक्तित्व अधूरा ही रह जाता है। अन्दरूनी गुणों के विकास के साथ यह कमी पूरी होने लगती है। इसके साथ जो शांति और आनन्द मिलने लगता है, उसका एक सुख दुनिया के करोड़ों सुखों से भी बढ़- चढ़कर होता है। ऐसे ही व्यक्ति सही नेतृत्व करते हैं और लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। गरीब- फकीर होने पर भी बड़े- बड़े महलों वाले उसके पैरों में गिरकर दया की भीख माँगते हैं।
     मनुष्य शरीर पाकर भी यदि इस जीवन में सद्गुणों के विकास पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, तो फिर क्या मनुष्य शरीर और क्या पशु शरीर? पशु तो फिर भी बेहतर सिद्ध होते हैं, जो अपने कर्मों को भोग कर इसके बोझ से हल्का होकर जाते हैं तथा अगली यात्रा को सरल बना देते हैं। जबकि मनुष्य अपने ईमान और धर्म से भटकने पर जो बुरे कर्म करता है, वे उसके इसी जीवन को नरक जैसा बना देते हैं और मरते समय पापों की भारी गठरी लादकर अगली यात्रा को और कठिन बना देते हैं। ऐसे में जिन्दगी उसके लिए घाटे का सौदा ही सिद्ध होती है।

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)
‘मानव जीवन की गरिमा’ पृ. १९- २०


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