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तीर्थ क्या हैं? उनका दर्शन व रहस्य क्या है? इस संबंध में विचार किया जाय तो प्रतीत होता है, तीर्थ वह स्थान है जहाँ जाकर मनुष्य को मानसिक तथा आत्मिक रूप से कुछ मिलता है, पर इस मिलने के साथ- साथ एक शर्त भी जुड़ी रहती है कि तीर्थसेवी की मनःस्थिति उसी स्तर की हो, अर्थात् अन्तःकरण खुला हो, तीर्थ की ऊर्जा अन्दर प्रवेश करने के लिए रास्ता साफ हो, सम्यक् ग्रहणशीलता की पात्रता हो। यह शर्त पूरी होने पर ही तीर्थ- यात्रा का उद्देश्य पूरा होता है। 
प्राचीन काल में वह सब था। यात्रियों का तीर्थक्षेत्रों में जाना तपस्वियों का तपोर्जन के लिए वीरानों में जाने जैसा होता था। वे तीर्थ में अपने आप को पवित्र करने के महान उद्देश्य लेकर जाते थे, तब फल भी वैसा ही मिलता था। 
पर आज स्थिति और हो गई है। तीर्थयात्रियों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती तो जा रही है, पर इसका कारण लोगों की श्रद्धा अथवा तीर्थों की उपयोगिता नहीं, वरन् यह है कि पर्यटन के लिए इन्हीं परम्परागत स्थानों के अतिरिक्त और कोई अधिक उपयुक्त स्थान दीख ही नहीं पड़ता। जबकि तीर्थ- यात्रा का वास्तविक उद्देश्य- आत्मशुद्धि, पिछली भूलों का प्रायश्चित और भावी जीवन को अधिक पवित्र- परिष्कृत बनाने का व्रत धारण करना होता है, मनोरंजन नहीं। मनोरंजन हुआ तो ऋषियों द्वारा प्रचलित तीर्थ की गरिमा व पवित्रता को नष्ट करके सांस्कृतिक विरासत को ही मिट्टी में मिलाने जैसा हुआ। 
तीर्थ में आकर कुछ पुण्य- परमार्थ करने की परम्परा है। मनःस्थिति बदलने के लिए परिस्थिति बदलने की भी आवश्यकता होती है। इसके लिए तीर्थों का दिव्य वातावरण हर दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होता है। जिस प्रकार कूलर की समीपता से ठण्डक और हीटर के पास जाने से गर्मी लगती है, उसी प्रकार तीर्थों का पवित्र वातावरण भावनाशील यात्रियों पर गहरी छाप डालता है और उसे उदात्त प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। ऋषियों द्वारा स्थापित तीर्थ- परम्परा का यही महान उद्देश्य रहा है। 
पर आज सब कुछ बदल गया है। लोग केवल मौज- मस्ती करने, मन बहलाने के लिए तीर्थस्थानों पर जाते हैं। यदि उस प्राचीन परंपरा को पुनर्जागृत किया जा सके, तो आज भी तीर्थ- सेवन उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। 
वैसे तीर्थ ढूँढ़ें, तो गुरु सर्वोत्तम तीर्थ हैं। वे अपने शिष्य के हृदय में व्याप्त अज्ञान- अन्धकार का नाश करने के लिए सदा ही ज्ञान का प्रकाश फैलाते रहते हैं। इसीलिए उनकी महिमा गाई गई है और उन्हें तीर्थ रूप कहा गया है। पुत्र के इस लोक तथा परलोक के कल्याण के लिए माता- पिता के समान कोई तीर्थ नहीं। जिसने माता- पिता का पूजन किया, उसे तीर्थलाभ मिल गया। उसके लिए माता- पिता का पूजन ही धर्म है, तीर्थ है, मोक्ष है और जीवन का शुभ फल भी वही है। 
मोह और अहंकार से रहित, सुख- दुःख, मान- अपमान और लाभ- हानि में एक समान, परिग्रह रहित तथा भिक्षावृत्ति से आजीविका चलाने वाले पुरुष पवित्र और तीर्थ रूप माने जाते हैं। तत्त्ववेत्ता और अहंकार से रहित पुरुष उत्तम तीर्थ कहलाते हैं। तीर्थ का अवलोकन करने वालों ने तीर्थ का लक्षण बताते हुए कहा है, जो सब प्रकार का त्याग करने में प्रसन्न रहते हैं, सर्वज्ञ होते हैं, समदृष्टि रखते हैं, शुद्ध आचरण वाले तथा समत्वभावापन्न होते हैं, वे पुरुष तीर्थ रूप कहलाते हैं। 
सद्गुणों को भी तीर्थ ही कहा गया है, यथा- सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना भी तीर्थ है, सब प्राणियों पर दया भाव रखना तीर्थ है और सरलता, हृदय की पवित्रता भी तीर्थ ही है। 
दान तीर्थ है, मन का संयम तीर्थ है, संतोष तीर्थ कहलाता है। ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है और प्रिय वचन बोलना भी तीर्थ है। ज्ञान तीर्थ है, धृति तीर्थ है, जप भी तीर्थ कहा गया है और तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ तीर्थ अन्तःकरण की- आध्यात्मिक शुद्धि है। किन्तु चित्त में दोष भरा है, तो वह कितना ही तीर्थ- स्नान करे, कभी शुद्ध नहीं होगा। जैसे मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से जल द्वारा सैकड़ों बार धोया जाय, तो भी वह पवित्र नहीं हो सकता, उसी प्रकार दूषित अन्तःकरण वाला मनुष्य भी बिना अपने अन्दर के दोषों का परिमार्जन किये केवल तीर्थ- स्नान से शुद्ध नहीं हो सकता। भीतर का भाव शुद्ध न हो, तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थ- सेवन, शास्त्र- श्रवण, ये सब कोई फल नहीं दे पाते; पर जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया, वह मनुष्य जहाँ भी निवास करता है, वहीं उसके लिए कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर आदि सभी तीर्थ उपस्थित रहते हैं। सारांश यह है कि अन्तःकरण शुद्ध होने पर ही तीर्थ- सेवन का सम्यक् फल मिलता है। इसलिए अन्तःकरण की शुद्धि पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए, तभी तीर्थाटन के लाभों की आशा की जा सकती है और यही तीर्थ का रहस्य है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार)


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