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दुःख मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति नहीं है। उसकी स्वाभाविक अनुभूति सुख है। यदि मनुष्य की स्वाभाविक अनुभूति दुःख होती, तो मानव मात्र हर समय रोते- कलपते ही नजर आते। पर ऐसा होता नहीं। हर मनुष्य अपने जीवन में अधिकांशतः हँसता है, खेलता और मौज मनाता हुआ दिखाई देता है। दुःख की स्थिति में तो वह यदा- कदा ही दिखलाई देता है और उस पर भी वह सुख, शांति और संतोष के सूत्र निकाल लिया करता है। बड़े से बड़े आघात को भी वह एक दिन, दो दिन, माह, दो माह में भूल जाता है और उसका शोक- संताप धीरे- धीरे शीतल और क्रमशः विलीन हो जाता है। यदि मनुष्य की स्वाभाविक मनुभूति दुःख होती, तो वह हर समय दुःखी ही बना रहता और तब ऐसी स्थिति में उसका जीवित रह सकना सम्भव न होता। इसके विपरीत वह एक लम्बी आयु तक जीता है और खुशी- खुशी जीता है। 
मनुष्य परमात्मा का अंश है। परमात्मा आनन्दस्वरूप है। अस्तु, मनुष्य की सहज अनुभूति सुखी होना असंदिग्ध रूप से प्रमाणित है। 
तब आखिर वह यदा- कदा भी दुःखी क्यों दिखलाईर् देता है? इसका कारण यह है कि वह किन्हीं परिस्थितियों से प्रभावित होकर दुखी दीखने लगता है। पर सब कुछ होने पर भी मनुष्य में विस्मरणशीलता की एक प्रवृत्ति रहती है, जिसके कारण वह बाद में सब कुछ भूल जाता है। किन्तु यह प्रवृत्ति बुरी नहीं है। यदि मनुष्य का स्वभाव चिर- स्मरण का हो जाय, तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाए। मनुष्य जीवन में ऐसी न जाने कितनी घटनायें आ जाती हैं, जो दुःखद होती हैं। यदि मनुष्य मस्तिष्क में विस्मरण की प्रणाली न बनी हो, तो वे दुःखद घटनाएँ बहकर न जा सकें और हर समय मस्तिष्क में जागरूक रहकर उसे पागल ही बना डालें। 
यह विस्मरणशीलता ही है, जिसके चलते वह सब कुछ भूल जाता है और फिर से सुख का मार्ग पकड़ लेता है। 
पर यह विस्मरणशीलता अत्यधिक होने लगे, तो इसे ठीक नहीं कहा जायेगा। क्योंकि जहाँ तक दुःख- आपदायों की स्थिति को भूलने की बात है, वह तो ठीक है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपने मूल स्रोत को, मूल स्वरूप को ही भूल जाय। अगर ऐसी स्थिति आती है, तो सतर्क होना चाहिए। उसे अपने बारे में सोचना चाहिए कि वह कौन है? कहाँ से आया है, क्यों आया है? उसे जाना कहाँ है और उसका कर्तव्य क्या है? वह सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के प्रति भी अपने कर्तव्यों- उत्तरदायित्वों का ध्यान रखना चाहिए और जिसने उसे समाज में भेजा है, संसार में भेजा है, उसके बारे में सोचना चाहिए कि क्यों भेजा है, उसका उद्देश्य क्या है? 
इस तरह जब नियन्तर सोचा जायेगा तो उस प्रभु के स्मरण भी होता जाएगा और अपने बारे में भी चिन्तन के चलने से आत्मबोध की साधना भी होती चलेगी। विस्मरणशीलता से स्मरणशील बनने का यह सरल सुगम रास्ता है। इसका निरन्तर अभ्यास करने से मनुष्य एक दिन अपने प्रभु के प्रति समर्पित होने के साथ- साथ अपने प्रति भी सजग रहता हुआ चलेगा और अन्ततः जीवन के गन्तव्य स्ततः प्रशस्त हो जाएगा। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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