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जिस प्रकार मनुष्य अपनी आँखों से अपनी आखें नहीं देख सकता, उसे देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है, उसी प्रकार अपना स्वरूप स्मरण करने के लिए परमात्मा का स्मरण, उनके प्रति समर्पण करना जरूरी होता है। उनके सदा- सर्वदा चिन्तन- मनन करते रहने से उनके प्रति प्रेम भाव और क्रमशः संपूर्ण रूप से समर्पण का भाव उत्पन्न होता है और अन्ततः चिन्तक- भक्त के सारे क्रियाकलाप उन्हीं के लिए होने लगते हैं। 
चिन्तन में हृदय की गहराई उसी के लिए आविर्भूत होती है जिससे प्रेम होता है। प्रेमी के जीवन से उसका प्रियतम सांगोपांग रूप से ओत- प्रोत हो जाता है। उसकी सारी भावनायें और कर्मों की सीमा अपने प्रियतम तक केन्द्रित हो जाती हैं। वह उसी के लिए जीता और उसी के लिए मरता है। प्रियतम प्रेमी का सर्वस्व बन जाता है और प्रेमी प्रियतम का हो जाता है। तथापि यह प्रेमभाव भी उसी के लिए उत्पन्न हो सकता है जिसको सम्पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर दिया जाए। 
अपना स्वरूप जानने के लिए, परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिए इस क्रम से चलना आवश्यक होता है कि उसे सम्पूर्ण आत्मसमर्पण कर हृदय की गहराई से स्मरण किया जाये। यह स्मरण चिन्तन के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। सतत चिन्तन की सिद्धि तभी सम्भव है, जब उपासना द्वारा परमात्मा के सम्पर्क में रहा जाये। उसे जानकर ही हम अपने को सरलतापूर्वक जान सकते हैं। 
यों तो कहने के लिए हम सब आस्तिक हैं; परमात्मा को जानते और मानते हैं; पर वास्तविकता यह है कि हम उसे जानते- मानते कुछ नहीं। बस, उसकी एक अबूझ- सी छाया मात्र, एक धुँधली- सी, भूली- बिखरी स्मृति भर हमारे किसी कोने में पड़ी रहती है, जो यदा- कदा चमक भर जाती है। लेकिन इतने मात्र को जानना नहीं कहा जा सकता। जानना तो तब माना जा सकता, जब वह हर समय हमारे हृदय पटल पर अंकित रहे, मन- मन्दिर में विराजमान रहे। 
पर यह सम्भव तभी हो सकता है, जब हम उसका बार- बार स्मरण करते रहें, उससे संपर्क बनाये रहें। जिन लोगों को हम कभी जानते थे, उनमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे, जिनको हम बिल्कुल भूल गये हैं। इसका एकमात्र कारण यही होता है कि या तो हम उनके सम्पर्क में नहीं रहते या बार- बार उन्हें याद नहीं कर रहे होते हैं। सामान्य उपभोग की वस्तुएँ भी जब बहुत दिन तक हमारे व्यवहार में नहीं आतीं, तो हमारे स्मृति पटल पर से उतर जाती हैं और हम उन्हें बिल्कुल भूल जाते हैं। विद्यार्थी प्रारम्भ में वर्णमाला गिनती याद करता है। उसके पहले वह उनको जरा भी नहीं जानता था। पर बार- बार याद करते रहने पर एक दिन वे सब याद हो जातीं और तब तक बनी रहती हैं, जब तक उनसे किसी प्रकार का संपर्क बना रहता है। कुछ दिन को भी संपर्क हटा देने या याद न करने पर उनकी स्मृति बालक के मस्तिष्क से निकल जाती है। तथापि वह पूर्ण तन्मयता के साथ आत्मसात् कर लेता है, तो वह उसे आजीवन ही याद बनी रहती हैं। 
स्मरण अथवा विस्मरण की जो बात किसी अन्य वस्तु अथवा व्यक्ति के विषय में है, वही परमात्मा के विषय में भी है। हम उसे बार- बार याद करते रहेंगे, तो वह हमारे मस्तिष्क में जीता- जागता रहेगा और जब हम उसे याद करना छोड़ देंगे, वह विस्मृत हो जायगा। 
जो वस्तु जितनी सूक्ष्म होती है, उसे हृदयंगम करने के लिए उतने ही सूक्ष्म, एकाग्र तथा निर्द्वन्द्व मनन, चिन्तन और स्मरण करने की आवश्यकता होती है। परमात्मा सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्व है। उसे साधारण और स्थूल बुद्धि द्वारा यदा- कदा मनन, स्मरण करने से हृदयंगम नहीं किया जा सकता। उसे हृदय की गहराई और सूक्ष्म विवेक द्वारा निरन्तर स्मरण करना पड़ेगा। तभी उनकी छबि हमारे अन्तःकरण में स्थायी रूप से बैठ पायेगी और तभी उनके और हमारे बीच आत्मीयता का मधुर संबंध बन पायेगा। वस्तुतः चिन्तन व आत्मसमर्पण एक- दूसरे के संबंध में सघनता लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में यह अद्वितीय साधना पद्धति है। अतः मनुष्य को सदा ही इसका अभ्यास करना चाहिए। 
(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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