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‘हम अपने भाग्य के निर्माता आप हैं’ जो इस महामन्त्र को जानते हैं, वे सफलता की राह पर तेजी से आगे बढ़ने लगते हैं। लौकिक उन्नति हो या आध्यात्मिक प्रगति, सब कुछ उन्हें आसानी से उपलब्ध होने लगती हैं। इसके लिए उपयोगी तत्त्व मुख्यतः सात हैं। इन्हीं ऊर्जा- धाराओं से जीवन में सफल होने का गर्व मिलता है। इनमें से पहला है- अटूट आत्मविश्वास के साथ प्रचण्ड पुरुषार्थ। दूसरा है- ईश्वरीय कृपा पर अडिग आस्था, तीसरा है- उद्देश्य के लिए सम्पूर्ण समर्पण का भाव, चौथा है- आगे बढ़ने के लिए कुछ भी कर गुजरने का बलिदानी साहस, पाँचवाँ है- परिवेश में सभी के साथ सौमनस्यपूर्ण व्यवहार, छठा है- कठिन परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन की क्षमता एवं सातवाँ है- प्रसन्न रहने एवं प्रसन्नता बाँटने की क्षमता। 
इन तत्त्वों की उपयोगिता व प्रभाव असीम है। ये जब अपने जीवन के सहभागी बनते हैं, तो क्रमिक रूप से सात सफलताओं की सुनिश्चित प्राप्ति होती है। इनकी क्रम संख्या कुछ इस तरह है- १. धन- समृद्धि की प्राप्ति, २. कार्यकुशलता में प्रवीणता, ३. सम्बन्धों का भावनात्मक विकास, ४. उत्तम स्वास्थ्य, ५. मानसिक क्षमता में चमत्कारी वृद्धि, ६. बौद्धिक क्षमता का अपूर्व जागरण, ७. आध्यात्मिक सफलता। ये ऐसे अनुभव हैं, जो अनेकों ने अनेक बार अजमाए हैं। हम स्वयं भी जब चाहें, आजमा सकते हैं। इन परिणामों में किसी भी प्रकार के सन्देह अथवा भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं है। 
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने जीवन में बहुसंख्यक लोगों को चमत्कारी सफलता की राह दिखाई है। उनके द्वारा चलाए गये युगनिर्माण योजना, गायत्री परिवार में असंख्य लोग हैं, जो एक साधारण मनुष्य से असाधारण बने हैं और सफलतापूर्ण जीवन जी रहे हैं। साधारण मनःस्थिति के लोग महान् विद्वान् बन कर समाज में सम्मानित जीवन यापन कर रहे हैं। 
जिन लोगों ने अपने जीवन में परिवर्तन कर स्वयं को दिव्य अनुदानों को आत्मसात् करने योग्य बनाया, वे इन दिव्य लाभों से अवश्य लाभान्वित हुए। इस तरह के उदाहरणों से हमारे सांस्कृतिक इतिहास के पन्ने- पन्ने भरे पड़े हैं। पर जिन्होंने अपने आप को नहीं बदल पाया, उन्हें उन दिव्य अनुदानों का लाभ नहीं मिल सका। वैसे तो वे मेघों की तरह हमेशा बरसते रहते हैं, पर योग्य पात्र को ही उनका लाभ मिल पाता है। 
वर्षों पहले सब तरह से हारा- थका एक व्यक्ति आचार्य श्री के पास आया। आचार्य जी ने उस व्यक्ति को गायत्री उपासना का मर्म समझाया। सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री गायत्री के अनेकानेक लाभों के बारे में बताया और कहा, यदि तुम गायत्री उपासना के साथ- साथ कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्रों को भी अपने जीवन में उतारोगे, तो अवश्य लाभ होगा। 
उन्होंने सूत्रों का वर्णन कुछ इस तरह किया, पहला सूत्र है- ‘अपने उद्देश्य का स्पष्ट निर्धारण और साथ ही उसकी प्राप्ति की तीव्र इच्छा।’ अगर इतना हो सका, तो ईश्वर की सहायता अवश्य मिलेगी। क्योंकि ईश्वर की कृपा उन्हीं को मिलती है जो पहले स्वयं पुरुषार्थ करते हैं। इसके लिए सौ कल्पनाएँ करने की बजाय एक सार्थक कल्पना को संकल्प में परिणत कर लो और उसके लिए पुरुषार्थ में जुट जाओ। 
दूसरा है- ‘प्रबल विश्वास’। यह विश्वास अपनी इच्छा पर भी हो, स्वयं पर भी और उस पर भी जिसको अपना इष्ट माना है और जिसकी पूजा- उपासना की जाती है। 
तीसरा है- ‘निरन्तर किन्तु संतुलित प्रयास- अनवरत पुुरुषार्थ’। अपने प्रयास में आने वाले विघ्रों से बिना घबराये जुटे रहना। मन से कभी हार न मानना। 
चौथा है- ‘परिस्थितियों को समझना- स्वीकारना तथा उनके साथ तालमेल’। पाँचवाँ है- ‘आशावादी दृष्टिकोण’। अर्थात् किसी भी स्थिति में अपने रास्ते से मुँह न मोड़ना और कभी न कभी सफलता मिलेगी ही, इस आशा के साथ सदा आगे बढ़ते जाना। 
जो निष्ठा के साथ इन सूत्रों पर अमल करेगा, वह निश्चित ही सफलता का स्वाद चखेगा। बस, एक बार हिम्मत करके लग तो जाये। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ हरिद्वार) 



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