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शरीर स्वस्थ व बलवान बनता है- संयम से और मन स्वाध्याय से। जीवन शैली को संयमित रखने, व्यायाम- वर्जिश करने से शरीर में निखार आयेगा। इस क्रम में यह बार- बार ध्यान रखिए कि शरीर के निखरे हुए सौन्दर्यपूर्ण आकर्षण का वास्तविक कारण जीवन की प्राण- क्षमता है और यह प्राणबल केवल तप एवं संयम से बढ़ता है। पवित्रता एवं शुचिता व्यक्ति को प्राणवान बनाती है जबकि भोग- विलास की प्रवृत्तियाँ प्राणबल को नष्ट कर देती हैं। शरीर को लम्बे समय तक आकर्षक बनाए रखने के लिए आपको लम्बे समय तक प्राण क्षमता से सम्पन्न बने रहना होगा। 
मानसिक स्तर पर क्षमतावान बनने के लिए स्वाध्यायशील बनिए, क्योंकि यह आपकी योग्यता में सहायक है। अपने भीतर की छुपी हुई प्रतिभा की पहचान करने में इससे मदद मिलती है। आपके भीतर कौन सी मौलिक योग्यता है, बिना देर किये उसकी पहचान कर लीजिए और उसके विकास के लिए जुट जाइए। संगीत, खेल, व्यवस्था, गृहकार्यों में कुशलता या ऐसे ही कुछ और हैं, जिनके बीज आपके भीतर हैं, उन्हें विकसित करने में देर न लगाइए। विद्या या कला किसी भी रूप में विकास करने के लिए संकल्पवान बनिए। यदि आप स्वयं में ऐसा कुछ खोजने में अपने आप को समर्थ नहीं पा रहे हैं, तो इस संबंध में अपने मित्रों, अभिभावकों तथा ज्ञानी, अनुभवी गुरुजनों से सम्पर्क कीजिए। गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार से भी संपर्क कर सकते हैं और यहाँ के नौ दिवसीय ऊर्जा अभिवर्धन साधना सत्र में भागीदारी करके अपने पुरुषार्थ को जगाने की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। 
नियमित प्रज्ञा योग- व्यायाम करने से शारीरिक शक्ति एवं मानसिक प्रतिभा का अभूतपूर्व विकास होता है। ध्यान रखिए, नियमितता ही शक्तिसम्पन्न बनने का राज है। इसके लिए आपको अपने में सद्गुणों को बढ़ाना होगा। सद्गुणों के विकास से आपके व्यक्तित्व में निखार आयेगा और आप हर कार्य में कुशलता हासिल करेंगे। 
समाज में सद्गुण ही आकर्षण उत्पन्न करते हैं। जिनके पास सद्गुण न हों, वे कभी उल्लेखनीय कार्य नहीं कर पाते। बस, हर समय वे अपनी मुसीबतों का रोना रोते रहते और दीन- हीन जीवन व्यतीत करते हैं। पर जिनके पास सद्गुण हैं, वे जीवन के अन्तिम समय तक ऐश्वर्यशाली जीवन जीते और शांति के साथ देह त्याग करते हैं। 
परन्तु क्षमतावान और शक्तिसम्पन्न होने के साथ संवेदनशील होना नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि संवेदना विहीन शक्ति व्यक्ति को अहंकारी बनाती है। यह सर्वविदित तथ्य है कि अहंकारी व्यक्ति जीवन संग्राम में कभी सफल नहीं होता। वह धन- वैभव एकत्रित कर सकता है, पर समाज में सम्मानजनक स्थान कभी अर्जित नहीं कर सकता। लोग उनसे हमेशा दूर ही भागते हैं। पर संवेदना की सुरसरि हो, तो लोग सदा ही उसमें स्नान करने के लिए दौड़ते रहते हैं। इसमें मुख्य रूप से तीन गुणों की अहं भूमिका रहती है- सेवा, उदारता और सहिष्णुता। इन तीनों की सहायता से आप अपने को क्षमतावान बना सकते एवं अपने साथ औरों को भी उससे लाभान्वित करा सकते हैं। 
एक बात और ध्यान रखिए, सदा दाता बनिए, भिखारी नहीं। देने वाला ही आकर्षक होता है। लोग उसी के पास जाते हैं, जो देता है। अपनी क्षमताओं का उपयोग सदा दूसरों के हित के लिए करिए। इस सूत्र को याद रखिए, परोपकारः पुण्याय पापाय पर पीडनम्। जो जितना दूसरों का हित करता है, वह उतना ही बड़ा पुण्यवान है। कहा गया है- 
औरों के हित जो जीता है, 
औरों के हित जो मरता है, उसका हर आँसू रामायण, 
प्रत्येक कर्म ही गीता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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