प्रतीक जीवन का मनोवैज्ञानिक सत्य है। सत्य चाहे वैज्ञानिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो या आध्यात्मिक, हमें उसे हृदयंगम करने के लिए प्रतीकों का सहारा लेना ही पड़ता है। युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द के अनुसार यह अनिवार्य आवश्यकता दार्शनिक ज्ञान एवं आध्यात्मिक उपासना के क्षेत्र में भी है। उनके अनुसार उपासना के लिए प्रतीक ऐसे हों, जो ब्रह्म के स्वरूप का बोध करा सकें। सच तो यह है कि परमात्मा का सबसे सार्थक प्रतीक तो स्वयं विश्व ही है। 
आचार्यों ने प्रतीकोपासना की व्याख्या अपने- अपने ढंग से करने की कोशिश की है। ब्रह्मसूत्र के श्रीभाष्य में आचार्य रामानुज कहते हैं— 
‘अब्रह्मणि ब्रह्मदृष्ट्याऽनुसन्धानम्’ 
अर्थात् जो वस्तु ब्रह्म नहीं है, उसमें ब्रह्मदृष्टि करना ब्रह्म का अनुसंधान है। आचार्य शंकर कुछ इस तरह का सत्य का विवेचन करते हैं— मन की ब्रह्म रूप से उपासना करो, यह आभ्यन्तर उपासना है और आकाश की ब्रह्म रूप से उपासना आधिदैविक है। मन अभ्यन्तर प्रतीक है और आकाश बाह्य। इन दोनों की उपासना ब्रह्म के रूप में करनी होगी। श्री अरविन्द के अनुसार प्रत्येक पदार्थ किसी उच्चतर सत्य का प्रतीक है। विश्व की संपूर्ण मानव जाति किसी न किसी रूप में प्रतीकों का उपयोग करती है। 
प्रतीकों का इतिहास काफी लम्बा एवं विस्तृत है। महाभारत, रामायण, वेद, उपनिषद् प्रतीकों से भरे पड़े हैं। वेद में प्रयुक्त ‘प्रतीक’ शब्द सामान्य धारणाओं के अर्थ में नहीं, बल्कि वह सतह और मुख के अर्थ में व्यवहृत होता है। विचारों के विकास के इतिहास को पलटने से जाहिर होता है कि मनुष्य पहले अपना काम चिह्नों और संकेतों के द्वारा चलाते थे। प्रतीकों की उत्पत्ति के बारे में भले ही मतान्तर हो, पर इतना सच है कि इसका आविर्भाव भारत में हुआ और बाद में यह समस्त देशों में प्रसारित हुआ। 
महर्षि अरविन्द के अनुसार प्रतीक निम्न प्रकार के होते हैं— 
१. रूढ़ प्रतीक- ये वे हैं, जो वैदिक ऋषियों ने आस- पास के पदार्थों से गढ़े थे। ऋषियों ने इनमें प्राण फूँके और ये उनकी उपलब्धि के अंग बन गये। ये उनके अन्तर्दर्शन में आध्यात्मिक प्रकाश की मूर्ति के रूप में प्रकट हुए। 
२. जीवन्त प्रतीक- ये प्रतीक व्यावहारिक जीवन से अथवा उन परिस्थितियों से अभाव से विकसित हुए हैं, जो जीवन के साधारण मार्ग को प्रभावित करते हैं। 
३. वे प्रतीक, जिनमें एक सहज औचित्य होता है। आकाश अथवा आकाशीय देश सनातन ब्रह्म का प्रतीक है। किसी भी जाति में इसका अर्थ एक समान होता है। सूर्य अखिल विश्व में अतिमानस प्रकाश का दिव्य विज्ञान ही व्यक्त करता है। 
४. मानसिक प्रतीक। इनके उदाहरण हैं अंग या वर्ण। ये मान्य होते ही कार्य करने लगते हैं। 
युगनायक स्वामी विवेकानन्द की मान्यता है कि प्रतीकों को मुख्य रूप से दो तरह से समझा जा सकता है—नित्य प्रतीक एवं कल्पित प्रतीक। नित्य प्रतीक अपने भाव या पदार्थ से सतत संबंध बनाए रखते हैं। इस भाव को किसी अन्य प्रकार से सूचित व व्यक्त करना संभव नहीं है। जैसे आकाश का प्रतीक शून्य है। कल्पनाओं के द्वारा कल्पित प्रतीक प्रकाश में आए। जैसे शक्तियों के नाम, राष्ट्र के ध्वज तथा अन्य चिह्न कल्पित होते हैं। कल्पित प्रतीक किसी भाव, घटना या बहुलता को सूचित करता है। जब कोई देश, संस्था या व्यक्ति अपने ध्वज, पदक चिह्न निश्चित करता है, तो उस चिह्न में उसका भाव निहित होता है। 
भारतीय संस्कृति में प्रतीक यथार्थ एवं वास्तविक हुआ करते थे। द्रष्टा ऋषि अपनी अनुभूति एवं साक्षात्कार द्वारा आकाश में इन प्रतीकों को देखते थे, फिर इन्हें समाज में प्रसारित करते थे। 
नित्य प्रतीक कई प्रकार के होते हैं—चिह्न प्रतीक, रंग प्रतीक, पदार्थ प्रतीक, प्राणी प्रतीक, पुष्प प्रतीक, शस्त्र प्रतीक, वृक्ष प्रतीक, वेश प्रतीक इत्यादि। 
भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक सर्वप्रधान चिह्न है। जिस प्रकार समस्त अक्षर अकार से उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार सारी रेखाकृतियाँ स्वस्तिक के अन्तर्गत आ जाती हैं। प्रणव ॐ की आकृति नादरहित होने पर स्वस्तिक मानी जाती है। यह कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। स्वस्तिक बुद्धिदाता गणेश जी का यन्त्र है। 
इस प्रकार प्रतीकों के पीछे रहस्यमय मनोविज्ञान छिपा हुआ है। प्रतीकों से मन काफी मात्रा में प्रभावित होता है। ध्यान- एकाग्रता आदि का अभ्यास भी इन प्रतीकों के माध्यम से किया जाता है। मनुष्य के मन पर इनका गहरा प्रभाव पड़ने के कारण ही प्रतीकों को भारतीय संस्कृति में इतना महत्त्व दिया जाता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स,गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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