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भावना चेतना का परमोच्च शिखर है। भावना गिरने पर कलुष- वासना बनती है और उठने एवं परिष्कृत होने पर परम वृत्ति का अनुभव होता है। इसके अभाव में मन अतृप्ति की कसक से कसकता रहता है। इसके अपूरणीय खालीपन से अंतर बुरी तरह से कसकता रहता है। जीवन में सब कुछ होते हुए भी इसकी कमी से मन तड़पता रहता है और इसके उपयोग की कला जानने वाले के जीवन में पल- पल चमत्कार घटित होता रहता है। 
जिसे हम भावना के रूप में पहचानते, जानते, समझते हैं, वस्तुतः वह भावना से कोसों दूर भावुकता होती है; क्योंकि हम भावना के साथ भोग, इच्छा एवं प्रतिफल की आशा भी जोड़े रखते हैं। इतने सारे विचार तत्त्वों के साथ बना हुआ मिश्रण भावना नहीं, भावुकता एवं वासना का मिला- जुला रूप होता है। आंतरिक भाव- सरिता में तरंगें शांत एवं स्थिर होती हैं, तो उस स्थिर भाव- दशा को भावना कहते हैं। इसमें लहरें तो होती हैं, परंतु स्थिर होती हैं, अचंचल होती हैं; परन्तु जब इन तरंगों में पल- पल परिवर्तन होता रहता है, अस्थिरता का आवेग फुटता रहता है, तो उसे भावुकता कहा जाता है। भावुकता अस्थिर एवं चंचल होती है। 
हम यो तो शुष्क बौद्धिक एवं तार्किक होते हैं, या कोरे भावुक। अत्यधिक तार्किकता हमारी अपरिष्कृत भावना को कुचल- मसल देती है और इसका परिणाम होता है कि महावैभव होते हुए भी हम प्रतिफल में भिखमंगेपन की कंगाली का कटु अनुभव करते रहते हैं। भावना की अधूरी समझ रखने वाले भावना को तर्क से अलग करते, विभेद एवं अंतर करते हैं। उनके अनुसार तर्क का अभाव ही भावना है; परंतु भाव- संवेदना के शिखर पुरुष श्री अरविन्द तर्क के अभाव को श्रद्धा नहीं, मूढ़ता का द्योतक मानते हैं। 
भावमूर्ति स्वामी विवेकानन्द एवं उनकी दो समर्पित शिष्याओं के बीच का संवाद बड़ा ही युक्तिपूर्ण है। उनकी दो शिष्याओं में एक निवेदिता के मन में प्रश्नों का महासागर लहराता रहता था, जबकि दूसरी शिष्या क्रिस्टीन (कृष्णप्रिया) कुछ भी सवाल- जवाब नहीं करती थी, शांत- प्रशांत भाव में बैठे स्वामी जी के उपदेशों को सुनती रहती थी। स्वामी जी के क्रिस्टीन के इस प्रश्नहीन भावदशा के बारे में पूछने पर क्रिस्टीन ने जवाब दिया कि प्रश्न तो मेरे हृदय में भी उठते हैं, परंतु आपके दिव्य महाभाव के महासागर में बुलबुले के समान विलीन- विसर्जित हो जाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने तर्क के इस विलय को श्रद्धा का नाम दिया है। 
तर्क एवं भावना के आधार पर तीन तरह के व्यक्तियों का परिचय मिलता है। प्रथम है- सामान्य से थोड़ा सा कम सामान्य मानव (इन्फ्रा ह्यूमेन बिइंग)। इन्हें मूढ़ मूर्ख की संज्ञा दी है। दूसरी श्रेणी में सामान्य मनुष्य (एवरेज ह्यूमेन बिइंग) आते हैं। ये सदा कुतर्क करते रहते हैं। इनके तर्कजाल में भावना फँसकर तड़पती रहती है। इन्हें कुछ भी हाथ नहीं लगता ।। तीसरी श्रेणी को परादिव्य मानव (अल्ट्रा ह्यूमेन बिइंग) कहा जाता हे। ये तर्क के कुदाल से भावभूमि की खुदाई करते हैं, अर्थात् इनमें एक सच्ची जिज्ञासा होती है। सच्ची जिज्ञासा महाशिखर तक पहुँच कर ही थमती है। अर्जुन की सच्ची जिज्ञासा न होती, तो गीता वाणी गाई ही न जाती। शिष्य में भावना की कमी नहीं होती, परंतु तर्क से, जिज्ञासा से ही वह तर्क से परे व पार भाव- संवेदना तक पहुँच पाता है। गुरु उसके सभी तर्कों का शमन कर भावना- श्रद्धा को प्रगाढ़ बनाता है। 
भावना, तर्क से पार की स्थिति है। भावना की परिष्कृति के परम बोध को श्रद्धा कहा जा सकता है। श्रद्धा चैतन्य ऊर्जा की चरम ऊँचाई पर पनपती, विकसित होती है। श्रद्धा ब्राह्मी भाव में अवस्थित होती है। श्रद्धालु ब्राह्मी चेतना में जीता है। श्रद्धा होगी, तो बोध होगा, अनुभव होगा। 
श्रद्धा अनुभव है, जिसे पाया, देखा और जिसमें जिया जाता है। अतः यह अन्धी नहीं तो सकती, जबकि विश्वास, तर्क और बौद्धिकता अनुमान हैं। अनुमान का गलत होना सहज संभव है। विश्वास टूटकर बिखर सकता है, परंतु अनुभव कैसे बिखरेगा? भावना के उत्तुंग शिखर पर अनुभव रूपी श्रद्धा प्रस्फुटित होती है। भक्त और भगवान् का दिव्य मिलन श्रद्धा है। श्रद्धावान की चेतना प्रभु की परम चेतना में विलीन हुई रहती है। ऐसी भावदशा महाभाव कहलाती है, जो बिरलों को ही प्राप्त होती है। 
श्रद्धा, भावना के दिव्य उपयोग से कुछ भी असंभव नहीं है, क्योंकि यहाँ अंतरिक्ष विज्ञान के ब्लैकहोल के समान अति संघनित ऊर्जा होती है। इसका उपयोग चमत्कारों से भरा होता है। 
प्रेम भावना का प्रथम अंकुरण बड़ा ही पावन एवं पवित्र होता है। भावना सृजन का पर्याय है। इसमें सृजन की शक्ति होती है। आज भावना और कल्पना के संयोग से जीवन का नया काव्य गढ़ने की बेहद जरूरत है। इसी से जीवन और समाज में नूतन सौंदर्य निखर सकता है। इसके लिए भावना को लुटाकर परम वृत्ति का आस्वादन किया जा सकता है। इसी अनुभूति में व्यक्तित्व के अगणित आयाम विकसित होते, खुलते चले जाते हैं। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स,गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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