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मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी माना गया है, परन्तु स्रष्टा ने उसके अन्दर की इच्छा शक्ति को प्रबल कर, दो रास्ते बना दिए हैं। वह चाहे तो अधोगामी प्रवृत्ति अपनाकर पशु तुल्य जीवन जिये अथवा उत्कृष्ट जीवन अपना कर देवोपम एवं सर्वश्रेष्ठ जीवन को अंगीकार करे। अतः विवेकशीलता ही मनुष्य का परम धर्म है। उसके आधार पर ही वह भले- बुरे के बीच अन्तर समझकर श्रेष्ठता, महानता के मार्ग पर अग्रसर होता है। मनुष्य अपने विवेक के आधार पर ही जीवन के मूल रहस्य को समझता है। शरीर को ही सबकुछ न मानकर वह आत्मा के अस्तित्व को भी स्वीकार करता है। शरीर उपभोग हेतु मिला है, परन्तु आत्मा आदर्श को ही अपनाती है। उपभोग और आदर्श दोनों में संतुलन बिठाना ही धर्म का लक्ष्य है, विवेक की परिणति है। दूसरे शब्दों में सदाचरण, आदर्शवादी व्यक्तित्व ही धर्म का पर्याय है। 
मानव जीवन को देवोपम बनाने के लिए धर्म विशेषज्ञों व महामनीषियों ने कुछ सिद्धान्तों, दर्शनों को प्रतिपादित किया है। उन्होंने वह मार्ग सुझाए हैं, जिससे व्यक्ति द्रुतगति से श्रेष्ठता की दिशा में अग्रसर हो सकता है। हर राष्ट्र एवं समाज में ऐसे व्यक्ति होते आए हैं। उन सबने प्रायः एक ही तरह के सिद्धान्तों को पूरे विश्व समुदाय के लिए प्रस्तुत किया है। आंशिक विभिन्नताएँ मात्र कर्मकाण्डपरक है, जो विभिन्न परिस्थितियों व सामाजिक संरचनाओं के आधार पर निर्धारित की गई हैं। मुख्य उद्देश्य सबका एक ही है। 
आज संसार में प्रमुख ग्यारह मजहब अथवा धर्म मत हैं। वे इस प्रकार हैं- जापान का शिन्तो मत, चीन का ताओ मत, चीन का ही कन्फ्युशियस मत, हिन्दुस्तान का वैदिक मत, बौद्ध मत, जैन मत, सिक्ख मत, पारसी मत, यहूदी मत, ईसाई मत तथा इस्लाम मत। ये सब वस्तुतः एक ही धर्म संदेश को विभिन्न रूपों में समझाने का प्रयास है। ये सभी मत हैं, स्वयं धर्म नहीं। धर्म तो मूलतः मनुष्य के मनुष्यत्व में, उसकी विवेकशीलता में सन्निहित हैं। धर्म का वास्तविक अर्थ है- कर्तव्यनिष्ठा, उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कर्तृत्व। प्रकारान्तर से इन्हीं सिद्धान्तों की पुष्टि विभिन्न मतों के माध्यम से की जाती है। 
जापान का शिन्तो मत पवित्रता को धर्म का प्रधान गुण मानता है। उसके अनुसार निश्छलता, पवित्रता का प्रमुख अंग है तथा ईश्वर प्राप्ति का राजमार्ग भी। अपनी पूजा पद्धति में शिन्तो सम्प्रदाय ने मनोनिग्रह हेतु ध्यान तथा पवित्रता हेतु मन्त्रोच्चार को व्यवहृत किया है। 
ताओ मत के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए पवित्रता, विनय, संतोष, करुणा, प्राणिमात्र के प्रति दया, सच्चा ज्ञान और आत्मसंयम मुख्य माध्यम है। इसकी प्राप्ति हेतु ध्यान और प्राणायाम उपयोगी प्रक्रियाएँ हैं। 
कन्फ्युशियस चीन के सुविख्यात धर्म प्रचारक एवं सिद्ध पुरुष हो चुके हैं। उन्होंने अपने दर्शन में मुख्यतया मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाने की बात कही है। उसका एकमात्र संदेश मानव मात्र के प्रति यही था कि वैयक्तिक उन्नति जीवन का लक्ष्य नहीं, वह तो सामाजिक उन्नति का फल है। उनका उपदेशामृत यह था कि सदाचार के प्रति निष्ठा, सौन्दर्य के प्रति अनुराग की तरह हृदय से होना चाहिए। 
वेदान्त दर्शन यह सिद्धान्त प्रतिपादित करता है कि मूल में सारा जगत् एक है, जिसे इस एकत्व का दर्शन हो जाता है, उसकी दृष्टि में स्वार्थ एवं परमार्थ में भेद नहीं रह जाता है। फलस्वरूप उसके हृदय में ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अन्तर्नाद गुंजित होने लगता है। वह व्यष्टि से समष्टि की ओर अग्रसर हो जाता है तथा सबके कल्याण में अपना कल्याण समझने लगता है। 
भगवान् बुद्ध ने स्वयं के जीवन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करके लोगों को पवित्र व श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दी थी। उनके अनुसार आर्य सत्य चार हैं- दुःख, दुःख का हेतु, दुःख निरोध का उपाय तथा दुःख का निरोध। दुःख के निरोध हेतु वे तृष्णा को सर्वतोभाव से परित्याग करने का संदेश देते हैं। बुद्ध मूलतः सदाचरण को ही महत्त्व देते थे। 
जैन मत का सिद्धान्त मुख्य रूप से यह है कि किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए तीन बातों की आवश्यकता होती है- श्रद्धा, ज्ञान और क्रिया। जैन शास्त्रों में इसे सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के रूप में उल्लेखित किया गया है। 
गुरु नानक देव ने सिक्ख धर्म रूपी ऋषि परम्परा का शुभारम्भ किया था तथा गुरु गोविन्दसिंह जी ने उसे प्रगतिशील बनाया था। तत्कालीन राष्ट्रीय समस्या को देखते हुए गुरु गोविन्दसिंह जी ने प्रत्येक अनुयायियों को राष्ट्र और मानवता हेतु अपनी आहुति, अपना बलिदान प्रस्तुत करने को कहा था। उस परम्परा को आगे भी बनाये रखने के लिए उन्होंने प्रत्येक सिक्ख को शास्त्रादपि शस्त्रादपि का ‘माला और भाला’ साथ रखने का, अनीति से सदैव जूझते रहने का संदेश दिया। 
पारसी धर्म के प्रवर्तक जरथुस्त्र हुए हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मनीति के मुख्य चरण है- हुमत अर्थात् उत्तम विचार, हुख्त अर्थात् उत्तम वचन और हुर्श्वत अर्थात् उत्तम कार्य। ईश्वर के साक्षी व प्रेरक रूप हेतु उन्होंने अग्नि को स्वीकृत किया तथा अग्नि की तरह प्रखर, प्रकाशवान, उर्ध्वगामी व परोपकारी वृत्ति बनाने की प्रेरणा दी। 
यहूदी मत का मूल दर्शन ईश्वर के एकत्व, ईश्वर की पवित्रता तथा उसकी निराकारिता में सन्निहित हैं। संसार के दो मुख्य मत- ईसाई और इस्लाम इसी से प्रस्फुटित हुए हैं। 
ईसाई मत के अनुसार प्रेम ही परमेश्वर है। प्रेम ही पूजा- आराधना है, उसकी परिणति है। अपनी प्रार्थना में हर ईसाई यह कहता है- ‘परमात्मन्! मुझे अपनी राह दिखा। मेरी मुक्ति का ईश्वर तू ही है। मेरा ज्ञानचक्षु खोल, जिससे मैं तेरी प्रेमपूर्ण आश्चर्यजनक कृतियों को समझ सकूँ।’ ईसाई मत के मूलाधार तो स्वयं ईसा हैं, जिन्होंने मानवता एवं आदर्श हेतु अपना बलिदान प्रस्तुत किया था। 
इस्लाम मत के संस्थापक हजरत मुहम्मद ने प्रत्येक मुसलमान को सदाचारी, कर्त्तव्यपरायण बनने का उपदेश जीवन भर दिया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की तरह उनकी घोषणा थी कि हर इन्सान अल्लाह का कुनवा है। तभी तो वे पुनः यह कहते पाये जाते हैं कि ‘आओ, तुम और हम मिलकर उन जीवों पर मेल कर ले जो हम दोनों में एक सी है।’ 
इन तथ्यों के आधार पर धर्म के मूलभूत दर्शन में कहीं भी कोई भिन्नता नहीं नजर आती। आज धार्मिक मान्यताओं के नाम पर होने वाले संघर्ष तथा आपाधापी को अज्ञानताजन्य कृत्य ही कहा जा सकता है। यह एक विडम्बना है कि लोग अपने मतों तथा धर्मप्रवर्तकों की दुहाई देते हैं, पर उनके दर्शन तथा आदर्श को अपने जीवन में ढाल नहीं पाते। यदि चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता तथा व्यवहार में शालीनता का समावेश किया जा सके, तो धर्म का वह स्वरूप प्रकट होगा, जहाँ विभेद नहीं, एकत्व स्थापित होगा, संघर्ष नहीं, वरन् सर्वत्र प्रेम, सहकार, उदारता व समर्पण का साम्राज्य होगा। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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