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व्यक्तित्व ढालने का सबसे उपयुक्त और सही समय वह है जिसे अध्ययन काल कहते हैं। किशोरावस्था और उभरती आयु में जोश रहता है, शरीर में सामर्थ्य और मस्तिष्क में धारणा शक्ति का बाहुल्य रहता है एवं प्रकृति प्रदत्त ऐसी और भी विशेषताएँ रहती हैं जिनके कारण व्यक्तित्व को जैसा चाहे वैसा ढाला जा सकता है। आयु जैसे बढ़ती जाती है, स्वभाव, संस्कार परिपक्व होने लगते हैं, फिर उनका बदलना कठिन पड़ता है। 
जोश अधिक और होश कम रहने के कारण उठती उम्र में किसी भी आकर्षण की ओर खिंच जाना सरल होता है। कहना न होगा कि अवांछनीय प्रवृत्तियों में आकर्षण और मनोरंजन अधिक है। पानी का स्वभाव नीचे की ओर गिरना है, मनोवृत्तियाँ भी पानी की तरह अधोगामी बनने के लिए सहज तैयार हो जाती हैं और फिर जीवन भर पिण्ड नहीं छोड़तीं। कहना न होगा कि दुर्गुणी व्यक्ति अपने लिए और संबंधित लोगों के लिए शोक संताप भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता हुआ अभिशाप जैसा नारकीय जीवन ही जी सकता है। इन्हीं दिनों यदि श्रेष्ठ वातावरण का संपर्क बना रहे और सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास किया जाता रहे, तो उसका प्रभाव सारे जीवन भर बना रहेगा और फलस्वरूप सुख, शांति की संभावनाएँ सदैव साकार होती रहेंगी। 
मित्रों का आकर्षण यों सदा ही रहता है, पर किशोरावस्था में उसके प्रति खिंचाव अपनी चरम सीमा पर रहता है। मित्रता बुरी नहीं, अच्छे साथी मिलें, तो विकास और प्रसन्नता की वृद्धि में सहायता मिलती है। पर दुर्भाग्य से आज आवारा और दुर्गुणी लड़के ही मित्रता के जाल में फँसाकर अच्छे लड़कों को अपने जैसा बना लेने का जाल फैलाते हैं। जो स्वयं पढ़ते- लिखते नहीं, खुराफातों में घूमते हैं, उन्हें अपनी आवारागर्दी के लिए साथियों की जरूरत पड़ती है। ये चालाक लड़के मीठी बातें करके ऊँचे सब्जबाग दिखाकर भले लड़कों को फँसातें हैं और धीरे- धीरे उन्हें आवारागर्दी के अनेक हथकण्डे सिखाकर ऐसा बना देते हैं, जो शिक्षा से वंचित रह जायें, स्वास्थ्य खो दें, स्वाभाव बिगाड़ लें और सम्मान एवं विश्वास गँवा बैठें। ये परिस्थितियाँ किसी का भविष्य अंधकारमय बनाने के लिए काफी हैं। इसलिए हर समझदार छात्र का कर्त्तव्य है कि मित्रता करने और दोस्तों के साथ घूमने के पूर्व हजार बार यह सोचें कि कहीं उसे आवारागर्दी की ओर तो नहीं घसीटा जा रहा है? आज की परिस्थिति में तो यही उपयुक्त है कि बिना गहरी दोस्ती के काम चलाया जाये और हर साथी से सामान्य शिष्टाचार और मेलजोल एक सीमा तक रखा जाए, जिससे समय की बर्बादी एवं किसी खतरे की आशंका न हो। 

किशोरावस्था की उम्र स्वास्थ्य संवर्धन के लिए उपयुक्त समय है। आहार- विहार का सोने- जागने का यदि ठीक से ध्यान रखा जाये, तो तन्दुरुस्ती ऐसी बन जायेगी जो जीवन भर साथ दे। इस संबंध में कामुकता के खतरे को पूरी तरह ध्यान में रखना चाहिए। गंदी फिल्में, गंदे गाने, गंदे उपन्यास, गंदे मित्र तथा गंदे विचार चित्त को उद्विग्न करते हैं तथा उन घिनौने कार्यों की प्रेरणा देते हैं, जिनसे शरीर और मस्तिष्क खोखला हो जाये और जवानी में बुढ़ापा आ घेरे। कच्ची उम्र में इस तरह का घुन लग जाने से देह जिन्दगी भर के लिए रोगों का शिकार बन जाती है और गृहस्थ जीवन भार बन जाता है। इसलिए इन दिनों ब्रह्मचर्य और सद्विचारों के बारे में पूरी सतर्कता रखी जाये और अश्लील परिस्थिति से ऐसे बचा जाये जैसे साँप, बिच्छू, आग और जहर से बचा जाता है। 
शिक्षा का ऊँचा स्तर ही व्यक्ति की भौतिक प्रगति का इन दिनों प्रमुख आधार है। अशिक्षित या स्वल्प शिक्षित व्यक्ति शारीरिक श्रम से थोड़ी आजीविका कमा सकता है। ऊँचे पद और कार्य कर सकने की योग्यता तो ऊँची शिक्षा के आधार पर ही मिलती है। व्यक्तिगत अर्थ लाभ या सम्मान प्राप्ति के लिए अथवा लोकमंगल के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकने के लिए ऊँची शिक्षा आवश्यक है। विचारशक्ति और व्यक्तित्व के निखार की दृष्टि से भी शिक्षा के महत्त्व को ठीक तरह समझा जाये और उसके लिए अधिक तत्परता, मेहनत एवं एकाग्रता कुछ कठिन न रह जाएगी और यह स्पष्ट है कि परिश्रमी एवं दिलचस्पी लेने वाले मंद बुद्धि छात्र अस्तव्यस्त तीव्रबुद्धि छात्रों से बाजी मार ले जाते हैं। 
शालीनता, सज्जनता का उपार्जन, सत्साहित्य का अध्ययन, मानविक संतुलन बनाये रखने, हँसमुख, शिष्ट एवं विनम्र रहने का सतत अभ्यास यदि नवयुवक करने लगें, तो उनके भीतर ऐसी अनेक विशेषताएँ उगती चली आयेंगी जिससे उनका भविष्य स्वर्णिम और शानदार बनने का मार्ग प्रशस्त होता चला जाएगा। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार, उत्तराँचल) 


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