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यह आवश्यक नहीं कि किसी को उन्नतिशील बनने के लिए उसके पास समुचित साधन होना चाहिए अथवा उसके अभिभावकों द्वारा उसके लिए शिक्षा तथा सुविधा जुटाने का प्रबन्ध किया ही जाय। यह यों तो अच्छी बात है, पर इनका अभाव रहने पर भी मनुष्य अपनी इच्छा- शक्ति एवं तत्परता के बल पर प्रतिकूलताओं को भी अनुकूलताओं में बदल सकता है और साधारण स्थिति की रुकावटों को अपने मनोबल के आधार पर दूर करते हुए उन्नति के शिखर तक पहुँच सकता है। 
डिजराइली का कथन है कि ‘सफलता का रहस्य उस कार्य में दृढ़ता और मनोयोगपूर्वक जुटे रहना है।’ कुछ लोगों का कहना है कि भौतिक सफलता अर्थहीन और बकवास है। किन्तु सफलता के प्रतीक के रूप में धन का अपना महत्त्व है। लेखक, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्त्तिकार, कृषक अथवा मजदूर कोई भी क्यों न हो, पेटभर भोजन तो सबको चाहिए; किन्तु रचनात्मक प्रवृत्तिओं का लक्ष्य मात्र धनोपार्जन नहीं होना चाहिए। विश्व के अनेक मेधावी ऐसे हैं, जो अभावों में जन्मे, असुविधाओं में पले और संघर्षों में जी कर भी सफलता के लक्ष्य तक जा पहुँचे। सूरदास जी आरम्भ में ऐसे ही थे; वे अंधे थे, पर अपने मनोबल और प्रयत्न- पुरुषार्थ तथा निरन्तर साधना के बल पर रसराज शृंगार और वात्सल्य रस के विश्व प्रसिद्घ कवि बन गए। 
अंध कवि होमर यूनान का विख्यात भिखारी था, किन्तु अपनी कृति से आज भी अमर है। इसी प्रकार रोम का महाकवि विर्जिल साधारण बाबर्ची का पुत्र था। अपने ढंग की बेजोड़ कथाओं का रचनाकार ईसप एक कुरूप- काला गुलाम था। डिमास्थेनस सिकलीगर परिवार में जन्मा था। उसका पिता छुरी- चाकू बनाकर आजीविका चलाता था; किन्तु डिमास्थेनस के भाषणों को आज भी याद किया जाता है। 
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन दयनीय दरिद्रता वाले परिवार में उत्पन्न हुए। उपयुक्त वातावरण और साधन न होते हुए भी ऊँचे दर्जे के वकील बने। राजनीति में प्रवेश किया तो चुनावों में १३ बार हारे। इतने पर भी उन्होंने अपना मन छोटा न होने दिया। मनोबल स्थिर रखा और प्रयत्नों में ढील नहीं की और अन्ततः अमेरिका के अद्वितीय प्रतिभावान राष्ट्रपति बन गये। इन अमेरिकी राष्ट्रपतिओं में जार्ज वाशिंगटन और गिरफिटा जैसों को पैतृक सुविधा साधन नहीं मिले, वरन् अभावों और प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपना रास्ता आप बनाते हुए आगे बढ़ सके। 
इतिहास के पन्ने ऐसे प्रतिभाशालियों की पुरुषार्थ गाथाओं से भरे पड़े हैं जिनने अपने संकल्प एवं पुरुषार्थ के बल पर अपने को ऊँचा उठाया और स्वयं को कुछ से कुछ बनाकर दिखा दिया। 
सफलताओं के लिए सुविधायें ही आवश्यक हों, ऐसी बात नहीं है। जिन्हें जीवन भर सुविधायें नहीं मिली, गरीबी व अभाव में जीकर भी उन्होंने ऐसे कार्य किये, जो सुख- सुविधायों में रहकर भी लोग नहीं कर सके। 
सफलता के लिए सफलता की कामना और दृढ़ इच्छा ही मुख्य है। उसके साथ- साथ प्रयत्न- पुरुषार्थ जुड़ जाय तो प्रगति का पथ अपने आप प्रशस्त होता चला जाता है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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