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इतिहास के पन्ने ऐसे प्रतिभाशालिओं की पुरुषार्थ गाथाओं से भरे पड़े हैं जिनने अपने संकल्प एवं पुरुषार्थ के बल पर अपने को ऊँचा उठाया और स्वयं को कुछ से कुछ बनाकर दिखा दिया। जिनने विभिन्न प्रकार की बलिष्ठताओं सम्बन्धी कीर्तिमान स्थापित किये हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे थे जिन्हें आरम्भिक दिनों में गया- गुजरा ही माना जाता था; पर अपने मनोबल का उपयोग करके आश्चर्यजनक प्रगति कर सकने में समर्थ हुए। 
हरियाणा के चंदगीराम आरंभिक दिनों में क्षय रोग से बुरी तरह ग्रसित थे। यूरोप के सैण्डो जुकाम से बुरी तरह पीड़ित रहते थे और शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र था; पर जब उन्होंने अपने शरीर को सँभालने का निश्चय किया और सुधार नियमों को दृढ़तापूर्वक कार्यान्वित करने लगे, तो संसार के माने हुए पहलवानों में उनकी गणना होने लगी और स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हो गया। 
कालिदास और वरदराज युवावस्था तक मूढ़मति समझे जाते थे। विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन तक की बुद्घि आरंभिक दिनों में बहुत मोटी थी; किन्तु इन लोगों ने जब अपने बुद्घि पक्ष में तीक्ष्णता लाने का दृढ़ निश्चय किया तो उनकी विद्वता प्रथम श्रेणी के मनीषियों में गिनी जाने लगी। प्रगतिशीलों की जीवन- गाथाएँ बताती हैं कि मनोबल और साहस ही छोटी परिस्थिति वालों को प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचाने में समर्थ हुए हैं। 
यह मनोबल किसी के द्वारा अनुदान में नहीं मिलता। अपनी व्यक्तिगत सूझ- बूझ के सहारे ही उसे बढ़ाया जाता है। मनोबल का प्रथम प्रयोग और अभ्यास अपने दुर्गुणों से जूझने और सद्गुणों को बढ़ाने के माध्यम से किया जाता है। लोग यह भूल जाते हैं कि छोटी- छोटी दुर्बलतायें मनुष्य को उसी प्रकार छूँछ बना देती हैं जैसे कि फूटे घड़े में से बूँद- बूँद पानी रिसते रहने पर उसे खाली कर देता है और इसके विपरीत एक- एक कण जमा करने से मनभर का बड़ा पात्र भर जाता है। 
दुर्गुणों में चोरी बेईमानी जैसे दोषों की प्रमुखतया निन्दा की जाती है; किन्तु सच पूछा जाय तो आलस्य और प्रमाद सबसे बड़े दुर्गुण हैं। अस्तव्यस्तता और अव्यवस्था के रहते कोई व्यक्ति न तो प्रतिभावान बन सकता है और न अन्यान्यों पर अपनी छाप छोड़ सकता है- भले ही वह कितना ही योग्य क्यों न हो। वह जिस काम में भी हाथ डालेगा, उसमें खामियाँ ही खामियाँ भरी दृष्टि गोचर होंगी। ऐसे लोगों को कोई दायित्वपूर्ण काम सौंपने में लोग कतराते हैं और बेईमान न होने पर भी अव्यवस्था के कारण उसे गया गुजरा मानते हैं। ऐसे लोग एक प्रकार से अपनी प्रतिष्ठा ही गँवा बैठते हैं, उन्नति तो दूर की बात रही। 
जो अपनी खामियों पर तीखी दृष्टि नहीं रखता और उन्हें सुधारने का प्रयास नहीं करता, समझना चाहिए कि उसका विधाता सदा प्रतिकूल ही रहता है। 
संकल्पबल, साहस और मनोबल की अभिवृद्घि का महत्त्व यदि समझ लिया गया तो यह समझना चाहिए कि आत्म- संतोष और लोक सम्मान का सुनिश्चित मार्ग मिल गया। व्यक्तित्व निखारने का राजमार्ग यही है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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