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कभी- कभी अनायास ही छोटी- सी काया में अपरिमित सामर्थ्य न जाने कहाँ से उद्भूत होने लगता है कि उस कार्य को करने पर व्यक्ति स्वयं आश्चर्यचकित हो उठता है। 
विगोरीज, फ्राँस के घोड़े की टाँग आखेट की उछल- कूद में टूट गई। घोड़े को उस दयनीय स्थित में छोड़ना क्रिस्टोफर ने उचित नहीं समझा। उसने ४२५ पौंड भारी घोड़े को कन्धे पर उठाया और डेढ़ मील की दूरी तक उतना भार वहन करते हुए उसे पशु- चिकित्सालय पहुँचाया। अपने भारवाहक के प्रति सहानुभूति ने ही उसके साहस को उभारा और उससे यह पुरुषार्थ सम्पन्न करा डाला। 
इटली के एक प्रमुख शहर गिरेरुपे में फिनोज पी वेग नामक फोरमैन बारूद के एक कारखाने में काम करता था, जहाँ धातुओं की परतों में बारूद के मिश्रण से छेद किये जाते थे। फिनोज पी वेग एक बरमे के पास जो कि चार फीट लम्बा और तेरह पौंड बजन का था, काम कर रहा था। अचानक कोई खराबी के कारण बरमा बड़े जोर से उचटा और उसकी आँखों के नीचे के भाग को छेदकर मस्तिष्क की हड्डियों को तोड़ता हुआ बाहर निकल गया। उसे अचेत अवस्था में ही एक मील दूर एक अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उसकी मरहम पट्टी बड़ी ही निराशा के साथ की, क्योंकि वेग के बचने के कोई आसार उन्हें दिखाई नहीं दे रहे थे। किन्तु रात के दस बजे जब वह होश में आकर बातें करने लगा, तो चिकित्सकों ने पूरे मनोवेग से उसकी चिकित्सा करना प्रारम्भ किया और तीन माह में ही वह पूर्ण स्वस्थ होकर घर चला गया। 
चिकित्सकों की अन्तिम रिपोर्ट आज के मूर्द्धन्य चिकित्सकों के लिए अध्ययन व आश्चर्य का विषय है। हावर्ट मेडिकल कॉलेज में वेग की टूटी खोपड़ी के अस्थिखण्ड व पदार्थ तथा कागजाद व वह बरमा भी सुरक्षित रखा है जो कि वेग की खोपड़ी को तोड़ता हुआ बाहर निकल गया था। शरीर विज्ञानियों को सहसा विश्वास नहीं होता कि इतने भयानक मस्तिष्कीय आघात के बाद भी कोई व्यक्ति जीवित रहकर अपना सामान्य जीवन- क्रम चला सकता है। 
साहस के प्रसंगों की शृंखला में सन् १८९१ की एक घटना है। एक अंग्रेज मछियारा अपने दल- बल के साथ एक विशालकाय ह्वेल मछली का, जो आकलैंड द्वीप के पास दिखाई दी थी, शिकार करने की चेष्टा करने लगा। दो नावों पर सवार मछुओं ने उस पर भाले से आक्रमण किया। ह्वेल ने पलटा खाया तो एक नाव उसकी पूँछ के नीचे आ गई और एक नाविक डूब गया। दूसरे जेम्स वर्टली को ह्वेल निगल गई; पर साहसी वर्टली ने अपना साहस नहीं खोया, बल्कि उसने अपने जेब से शिकारी चाकू को प्रयत्न करके किसी प्रकार निकाल लिया और पेट में जकड़े रहने पर भी उसने मछली के पेट को काटना प्रारम्भ किया। कुछ घण्टों के परिश्रम के बाद वह सफल हो गया। दो दिन के बाद उसे नाविकों ने अचेत अवस्था में समुद्र की सतह पर से निकाला और अस्पताल पहुँचाया, जहाँ चिकित्सकों के तीन सप्ताह के प्रयास के बाद उसकी बेहोशी टूटी। मछली के पेट में उसका शरीर बुरी तरह क्षत- विक्षत हो गया था। उसे पूरी तरह स्वस्थ होने में दो महीने लगे। अपने धैर्य और मनोबल के कारण ही बर्टली जीवित ह्वेल के पेट में से जीवित निकल सका। प्रेस फोटोग्रार्फ्स व इण्टरव्यू लेने वालों के लिए वह एक अजूबा बन गया था। उसने प्रमाणित कर दिखाया कि यदि इच्छा- शक्ति हो, तो किसी भी खतरे से निपटा जा सकता है। 
इच्छा- शक्ति हो तो कोई भी कार्य असाध्य नहीं होता। विघ्न- बाधाएँ आती तो जरूर हैं, पर अधिक समय तक उसका मार्ग अवरुद्ध कर टिक नहीं पातीं और अन्ततः इच्छा- शक्ति संपन्न साधक अपने उद्देश्य की ओर बढ़ता ही चला जाता है। बस अपनी अद्भुत व असीम इच्छा- शक्ति पर भरोसा रखते हुए उसे पहचानने का प्रयत्न करना चाहिए। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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