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गायत्री महामन्त्र की शक्ति असाधारण है। उसमें भरी हुई शिक्षा को यदि हृदयंगम किया जा सके, विचारणा को सद्बुद्धि में, ऋतम्भरा प्रज्ञा में परिणत किया जा सके, तो समझना चाहिए कि नर को नारायण रूप में परिणत होने की सम्भावनाओं का पथ प्रशस्त हो गया। इन अक्षरों का गुन्थन शब्द विद्या के उस रहस्यमय सूत्रों के आधार पर किया गया है, जिनके कारण षट्चक्र- तीन ग्रन्थियाँ, पावन उपत्यिकाएँ जैसे प्रसुप्त शक्ति- केन्द्रों का जागरण होता है और मनुष्य सामान्य से असामान्य बनने की दिशा में बढ़ चलता है। 
गायत्री साधना की उत्कृष्टता के संबंध में किसी भारतीय धर्मानुयायी को संदेह करने की गुंजाईश नहीं है। सन्ध्या के रूप में दैनिक आवश्यक धर्म- कर्तव्य निर्धारित किया गया है। शिखा और यज्ञोपवीत के रूप में मस्तक और हृदय जैसे आधार अंगों पर गायत्री की ही प्रतिष्ठापना है। प्रायः सभी अवतार, ऋषि, योगी और तत्त्ववेत्ता गायत्री उपासना के माध्यम से आत्मबल अभिवर्धन और भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते रहे हैं। निस्संदेह योगाभ्यास के, मन्त्र साधना के क्षेत्र में गायत्री मन्त्र की गरिमा सर्वोपरि है। जीवन शोधन की, परिष्कार साधनाओं में उसका स्थान सबसे अगला और सबसे ऊँचा है। 
गायत्री उपासना के समय ध्यान नितांत आवश्यक है। यह दो प्रकार का हो सकता है। एक साकार, दूसरा निराकार। दोनों में से इच्छानुसार किसी को भी चुना जा सकता है। साकार उपासना में भावनात्मक उत्कर्ष की गुंजाइश रहती है जबकि यह लाभ निराकार साधना में नहीं मिल पाता। निराकार साधना के लिए दूसरी कई विधियाँ मौजूद हैं, अस्तु, यही उपयुक्त समझा गया है कि निर्धारित साकार ध्यान- साधना को ही प्रश्रय दिया जाय। 
हमें वस्तुस्थिति समझनी चाहिए और तामसी असुरता को निरस्त करके सतोगुणी देवत्व की ओर प्रगति करनी चाहिए। ध्यान धारणा का लक्ष्य भी यही होना चाहिए। उसमें ऐसे भावचित्र प्रस्तुत किये जाने चाहिए जिनमें अपनी अवांछनीय स्थिति की ओर समुचित ध्यान देने, उसकी हानियों को समझने और उन्हें निरस्त करके उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा भरी पड़ी हो। 
जप प्रारम्भ करने के साथ- साथ ध्यान- धारणा में अपने स्वरूप की स्थापना इस रूप में करनी चाहिए कि मैं एक छोटा बालक हूँ। टट्टी और गन्दगी लिपटा हुआ। हाथ- पैर सभी को उस गंदगी से पोतकर घिनौना बना लिया है। माता से गोदी में लेने का अनुरोध करते हैं, पर वह सुनती ही नहीं और भवें तरेरते हुए स्पष्ट कर देती है कि जब तक गन्दगी को धोकर सफाई न कर ली जाएगी, तब तक गोद में लेने की, प्यार करने की बात नहीं बनेगी। ठीक भी है, बच्चे की गन्दगी के कारण माँ अपने कपड़े और शरीर को गन्दा क्यों करे? गोदी में लेने का आग्रह रोते बिलखते किया जा रहा है, पर माता की ओर से इसकी कोई सुनवाई नहीं की जा रही है। 
ध्यान का उत्तरार्ध पन्द्रह मिनट का यह है कि अपने छोटे बच्चे शरीर को स्नान कराया, मलीनता कणों को धोकर साफ किया, गोदी में उठाया, अच्छे कपड़े पहनाए, प्यार किया, दुध पिलाया। अपनी सहज करुणा का, भावभरे वात्सल्य का परिचय दिया और मनोकामना पूर्ण करके हर्षोल्लास का अनुदान प्रदान किया। 
गायत्री जप के समय का यही दो पक्षीय ध्यान है। इसमें उस कारण का स्पष्टीकरण है जिससे साधकों को इष्टदेव का अनुग्रह प्राप्त करने से वंचित रहना पड़ता है। उस सुझाव का भी निर्देश है जिसे अपनाने पर ईश्वर प्राप्ति जैसा महान सौभाग्य मिल सकता है। जब तक हम कषाय कल्मष, दोष- दुर्गुणों में सिर से पैर तक डूबे पड़े हैं, तब तक कैसे आशा कर सकते हैं कि भगवान् हमें अपना अतिरिक्त स्नेह अनुग्रह प्रदान करेंगे। मनुष्य अपने चिन्तन और कर्तृत्व का स्तर ऊँचा उठा सकता है। इसी तथ्य के लिए आवश्यक अन्तःप्रेरणायें प्राप्त करना साधना उपक्रम का उद्देश्य है। 
गायत्री मन्त्र का, उसके जप का अपना महत्त्व है। ध्यान धारणा के साथ में जुड़ जाने का अतिरिक्त महत्त्व है। एक तो चिन्तन के लिए, कल्पना के लिए विस्तृत क्षेत्र मिल जाता है और मन को उसमें उलझा रहने का अवसर मिलता है। मन को एक नियत निर्धारित काम मिल जाने से उसकी अनावश्यक और अवांछनीय घुड़दौड़ बन्द हो जाती है। चित्तवृत्तियों के निरोध की आवश्यकता बहुत हद तक इससे पूरी होती है। इसके अतिरिक्त आत्मशोधन का, परिष्कृत जीवन का क्रम अपनाने पर ही पूर्णता का, भगवत् प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त हो सकने की स्थिति बनती है। दोनों ही उपक्रम इस ध्यान उपक्रम के साथ गायत्री उपासना करने से पूरे होते हैं। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, हरिद्वार) 


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