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मुम्बई के प्रख्यात साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ के सम्पादक संचालक श्री करेंजिया लन्दन गये थे। वहाँ रह रहे विश्वविख्यात विचारक कोयस्लर से उन्होंने भेंट की। इस भेंट में अन्य विषयों के अतिरिक्त परमाणु युद्ध की सम्भावना और उसकी विश्वव्यापी प्रतिक्रिया पर लम्बा वार्तालाप हुआ। श्री करेंजिया ने उनसे पूछा- ‘यदि अणु आक्रमण हुआ, तो हम अपनी रक्षा कैसे करेंगे?’ इसके उत्तर में कोयस्लर ने कहा- ‘गायत्री मन्त्र में हजार परमाणु बम से भी अधिक शक्ति है। यदि भारतवासी सामूहिक रूप से गायत्री मन्त्र की उपासना को आरम्भ कर दें, तो उससे प्रकट होने वाली शक्ति आक्रमणकारियों के हौसले पस्त कर सकती है।’ 
श्री कोयस्लर ने ठीक ही कहा था, क्योंकि शब्द को प्रकाश से भी अधिक समर्थ शक्तिशाली माना जाता है। मन्त्र विज्ञान एक अति समर्थ तथा सूक्ष्म विज्ञान है। भारतीय मनीषियों ने तो शब्द को ब्रह्म कहा है। ब्रह्म या परमात्मा विराट् तथा सर्वव्यापी चेतन सत्ता का नाम है, जिसकी शक्ति का कोई पारावार नहीं। मन्त्र- शक्ति की महत्ता इन शब्दों से ज्ञात हो जाती है- 
मन्त्र परम लघु जासु बस विधि हरिहर सुरसर्व। 
महामन्त्र गजराज कहँ बस कर अंकुश खर्व॥ 
मन्त्र जप की महिमा का गान करते हुए गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है ‘यज्ञानां जप यज्ञोऽस्मि’ अर्थात् यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूँ। 
जप के लिए गायत्री मन्त्र अपनी विशिष्ट शब्द गुंफन के कारण सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। 
गायत्री मन्त्र के जप को जो प्रधानता दी गई है, इसका एक कारण यह भी है कि महाप्रज्ञा का उच्चस्तरीय तत्त्वदर्शन इसमें समाहित है। सद्बुद्धि की प्रेरणा से मानव मात्र का कल्याण सोचने वाले आर्षपुरुष, ऋषि- महर्षियों ने इसे वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता तक कहा है। गाँधी जी ने इसे भावी विश्वधर्म या संस्कृति का मूल आधार माना है व कहा है कि विश्व में कभी भी यदि व्यापक शांति आयेगी, तो इस महामन्त्र की प्रेरणा- शक्ति से ही आयेगी। 
गायत्री का देवता सविता सूर्य है। वह ब्रह्माण्डव्यापी चेतना- ऊर्जा का उद्गम स्रोत है। उसकी चित्- शक्ति अनन्त अन्तरिक्ष के अज्ञात प्रदेश से प्रतिक्षण पृथ्वी पर बरसती रहती है। इन चैतन्य ऊर्जाओं की अनुभूति का माध्यम है ‘श्रद्धातत्त्व’। इनसे सम्पर्क की सशक्त प्रक्रिया है ‘भावपूर्ण स्मृति- सातत्य’। मन्त्र साधना इसी प्रक्रिया का एक अंग है, जिसमें ध्वनिविज्ञान, श्रद्धाशक्ति तथा चेतना विज्ञान का समन्वय है। मन्त्राराधन में प्रथम आधार है- ध्वनिविज्ञान। ध्वनि अपने आप में एक शक्ति है और इसका विशेष उद्देश्य से, विशिष्ट प्रकार से यदि प्रयोग होता है, तो इसका अपना प्रभाव होता है। इस ध्वनि- प्रभाव की वैज्ञानिकता से मन्त्र जप की विशिष्ट महत्ता है। इनके ऊपर है चेतना विज्ञान के सूक्ष्म नियम। गायत्री मन्त्र का शब्दार्थ भी ऐसा है, जो चिन्तन को एक विशेष दिशा देता है, सोचने का महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। 
गायत्री महामन्त्र का जो समग्र उच्चारण नहीं कर सकते, वे केवल ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस पञ्चाक्षरी मंत्र को याद कर जप कर सकते हैं। जिन्हें इसमें भी कठिनाई हो, वे केवल ‘ॐ’ का ही जप कर वैसा ही फल प्राप्त कर सकते हैं। तात्पर्य यह है कि किसी भी प्रकार से हो, मंत्र जप को अपनी दिनचर्या में अवश्य स्थान देना चाहिए, क्योंकि मन्त्रविज्ञान एक अति समर्थ तथा सूक्ष्म विज्ञान है। 
यों तो गायत्री मन्त्र के अर्थ, स्वरूप और प्रभाव से अनेक लोग परिचित हैं, पर उसकी भौतिक क्षेत्र में असाधारण रूप से कार्य कर सकने वाली क्षमता का अनुभव दूसरे लोगों ने वैसा नहीं किया, जैसा कि साम्यवादी से अध्यात्मवादी बन जाने वाले महान दार्शनिक आर्थर कोयस्लर ने किया है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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