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सनातन धर्म में जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वरतुल्य अपने जीवन की श्रेष्ठतम सम्भावनाओं एवं शक्तियों को उपलब्ध करना है। इसी लक्ष्य को यहाँ विविध नामों से परिभाषित किया गया है। आत्म साक्षात्कार, मोक्ष, मुक्ति, पूर्णता प्राप्ति, कैवल्य, समाधि, स्थितप्रज्ञता, ईश्वर प्राप्ति आदि इसी के कुछ पर्याय हैं। इस लक्ष्य को प्राप्ति के लिए मनुष्य की प्रकृति पात्रता एवं रूचि व अनुरूप यहाँ विविध साधना मार्गो का अन्वेषण ऋषियों ने किया है। इनमें से कुछ प्रमुख साधना पद्घतियाँ इस तरह से हैं—१.मंत्र योग साधना २ कर्मयोग साधना ३ ज्ञानयोग साधना ४.भक्तियोग साधना ५ राजयोग साधना ६ तन्त्र साधना १.मंत्र योग साधना 
मन्त्र योग साधना, सतनातन धर्म में सबसे प्रचलित साधना पद्घति है। और यह साधना का सबसे सरल एवं सुगम मार्ग भी है, किन्तु अपने प्रभाव में अद्भुत एवं आश्रर्यजनक। प्राचीन काल मैं योगी ऋषि एवं तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने मन्त्रबल से ही पृथ्वी, देवलोक एवं ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पायी थी। उन्हें इस शक्ति के बल पर कुछ भी कार्यर् असंभव नहीं था। रोगोपचार से लेकर आत्मकल्याण, शाप- वरदान से लेकर ग्रह नक्षत्रों की जानकारी सभी कुछ इससे संभव था। भारत भूमि में जितनी शोधें मन्त्र- शक्तियों पर हुईं, उतनी और किसी पर नहीं हुई हैं। मंत्रों के आविष्कारक होने के कारण ही ऋषि मन्त्रद्र्रष्टा कहलाये। वेद और कुछ नहीं, एक प्रकार के मंत्र विज्ञान हैं। 
मंन्त्र शब्द ‘मन’ और ‘त्र’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जिनका अर्थ है मनन और त्राण। इसी तरह मंत्रार्थ मंजरी के अनुसार- मनन त्राण धर्माणो मंत्रः अर्थात् मनन और त्राण मन्त्र के दो धर्म है। इस तरह मंत्र के जप के साथ इसके अर्थ पर मनन करते हुए अपने ध्यान को इष्टदेव पर केन्द्रित किया जाता है और इसकी कृपा से संसार सागर से त्राण व मुक्ति मिलती है, यही मंत्र- योग साधना है। 
जपात् सिद्धि सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः। जप के साथ दोष मिटते जाते हैं और अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। इसी क्रम में एक दिन साधक सिद्धि प्राप्त कर लेता है। पर पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में मंत्र जप वही सार्थक है, जिसमें मानसिक एकाग्रता एवं निष्ठा का समुचित समावेश हो, परिष्कृत व्यक्तित्व की परिमार्जित वाणी से जिसकी साधना की जाय, जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके उसे गोपनीय रखा जाय। गोपनीय का यहाँ अर्थ है- मिलने वाले फलों एवं अनुभूतियों की अनावश्यक चर्चा कर उसके प्रभाव को हल्का न बनाना। 
प्रत्येक मन्त्र के पाँच तत्त्व होते हैं- ऋषि, छन्द, देवता, बीज, तत्त्व। ऋषि से आशय ऐसे व्यक्ति या मार्गदर्शक गुरु से है, जिसने उस मन्त्र में पारंगता प्राप्त की हो। छंद का अर्थ है- लय, मंत्र की संरचना और उच्चारण शैली। देवता का अर्थ है- मंत्र शक्ति की पर्याय प्रतिनिधि, शक्ति प्रवाह। बीज से अर्थ है उद्गम। इसे किसी मंत्र में शक्ति भरने का सूक्ष्म इंजेक्शन भी कहते हैं। ह्रीं, श्रीं, क्लीं आदि ऐसे ही कुछ विशिष्ट बीज अक्षर हैं। तत्त्व जो अंतिम अंग है- यही मंत्र की कुंजी है। पंचतत्त्वों और गुणों के रूप में इसका उल्लेख होता है। उस तत्त्व के अनुरूप पूजा- उपकरण, इकट्ठा करके भी तत्त्व की साधना की जाती है। मंत्र जप प्रक्रिया में चार तथ्य काम करते हैं १.ध्वनि २.संयम ३.उपकरण, ४.विश्वास। मंत्र का शुद्ध उच्चारण होना चाहिए। अपनी शारीरिक, मानसिक शक्तियों को असंयम से बचाकर मंत्र साधना में नियोजित करना होता है। माला, आसन आदि उपकरणों का शुद्ध होना आवश्यक है। और सबसे अधिक आवश्यक है मंत्र साधना के प्रति श्रद्धा और विश्वास। मंत्र जप में उच्चारण तो मात्र मंत्र का कलेवर है, प्राण है उसकी भावनाएँ। हृदय को शिव, प्राण एवं अग्नि की तथा जिह्वा को शक्ति, रवि एवं सोम की उपाधि दी गई है। भावपूर्वक जप करने से शब्द शक्ति के विस्फोट से निश्चित ही फलदायी परिणाम उपलब्ध होते हैं। साइमेटिक्स के सिद्धांत के अनुसार मंत्र साधना के द्वारा देवता के प्रति प्रगाढ़ विश्वास एवं अर्थ के ध्यान के साथ, जप द्वारा ब्रह्माण्ड में एक अनूठा भाव- वृत्त एवं ध्वनि- वृत्त बनता है, जो उच्चारणकर्त्ता के व्यक्तित्व को पकड़- जकड़कर अभीष्ट दिशा की ओर तोड़- मरोड़कर ढाल देता है। पूज्यवर पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में गायत्री मंत्र पर यह सिद्धांत ऐसा सटीक बैठता है कि इसके परिणाम कभी संदिग्ध नहीं रहते। साधना महासागर, भावविह्वल होकर किए गए सुनिश्चित विधि विधानपूर्वक गायत्री के जप, अनुष्ठान द्वारा जीता जा सकता है एवं भावी विषम संभावनाओं को निरस्त किया जा सकता है, यह विश्वास रखकर हर साधक बिना प्रमाद के इसमें जुटे रहना ही चाहिए। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्रीतीर्थ, हरिद्वार) 


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