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भारतीय प्रजातंत्र की विधि- व्यवस्था के लिए डॉ० अंबेडकर की अध्यक्षता में बने संविधान की तरह एक समय भारतीय समाज जिस विधि- व्यवस्था के अंतर्गत चलता था, उसका नाम ‘मनुस्मृति’ है। भगवान् मनु ने गायत्री उपासना को राष्ट्रीय उपासना का स्थान प्रदान किया था। मनुस्मृति में इस महान् तत्त्वज्ञान और उपासना की पग- पग पर महत्ता प्रतिपादित की गई है। कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं। 
जप्येनैव तु संसिध्येद् 
ब्राह्मणो नात्र संशयः। 
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो 
ब्राह्मण उच्यते॥ 
मनु०२ /८७ 
अर्थात्- गायत्री उपासना समस्त सिद्धियों की आधारभूत है, गायत्री- उपासक अन्य कोई अनुष्ठान न करे तो भी सबसे मित्रवत् आचरण करता हुआ ब्रह्म को प्राप्त करता है, क्योंकि जप से उसका चित्त ब्राह्मीचेतना की तरह शुद्ध व पवित्र हो जाता है। 
पूर्वां संध्यां 
जपंस्तिष्ठेत्सावित्री मार्कदर्शनात्। 
पश्चिमां तु समासीनः 
सम्यगृक्षविभावनात्॥ 
मनु०२ /१०१ 
अर्थात्- हे तात! प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व से सूर्योदय तक खड़ा होकर गायत्री का जप करने वाला, सायंकाल तारों के निकलने तक बैठकर जप करने वाला उपासक भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का अधिकारी बनता है। 
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः। 
सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितं॥ 
मनु०२ /१०४ 
अर्थात्- नगर की अशांति से दूर वन में किसी सरोवर के समीप जाकर की गई गायत्री उपासना से मन की एकाग्रता और असीम शांति का लाभ मिलता है। 
सावित्रीमात्रसारोऽपि 
वरं विप्रः सुयन्त्रितः। 
नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि 
सर्वाशी सर्वविक्रयी॥ 
मनु०२ /११८ 
अर्थात्- केवल सावित्री की उपासना करने वाला संयमी पुरुष- सर्वभक्षी, सब कुछ बेचने वाले वेदपाठी ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ कहलाता है। 
एतदक्षरमेतां च 
जपन्व्याहृतिपूर्विकाम्। 
संध्ययोर्वेदविद्विप्रो 
वेदपुण्येन युज्यते॥ 
मनु०२ / ७८ 
अर्थात्- ओंकार और व्याहृतिपूर्वक दोनों संध्याओं के समय गायत्री उपासना करने वाले को स्वयं ही वेदज्ञान प्राप्त हो जाता है। 
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य 
बहिरेतत्रिकं द्विजः। 
महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिर्विमुच्यते॥ 
मनु०२ / ७९ 
अर्थात्- जो महापातक किसी अन्य तरह नहीं छूट सकते, प्रतिदिन एक हजार मंत्र जप करने से वैसे ही छूट जाते हैं, जैसे सर्प केंचुली छोड़ देता है। 
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतंद्रितः। 
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान्।। 
मनु०२ /८२ 
अर्थात्- ‘‘यदि उपासक तीन वर्षों तक निरालस्य, नियम पूर्वक गायत्री मंत्र का जप करता है, तो वह वायु और विराट् आकाश में व्याप्त चेतना को भली प्रकार जान लेता है और परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकार पा लेता है।’’ 
यह प्रतिस्थापनाएँ निस्संदेह बहुत महत्त्वपूर्ण थीं। जब तक इनका परिपालन हुआ, देश भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से विश्व शिरोमणि रहा। इस महाशक्ति से वंचित हो जाने से ही देश की नींव खोखली हो गई। उन्हें फिर से सदृढ़ बनाने के लिए गायत्री उपासना को व्यापक बनाया जाना अनिवार्य है। 

(शान्तिकुञ्ज फीचर्स, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार) 


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