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सिख धर्म में यज्ञ का वैसा ही महत्त्व स्वीकारा गया है जैसा कि हिंदू धर्म के अन्य वर्ग संप्रदायों में ।। गुरुवाणी में यज्ञ- महिमा का उल्लेख अनेकों स्थानों पर मिलता है यथा- 
तित धोए होम जदा सद पूजा। 
पइयै कारण सो है॥ 
(वार माफ म०१ गु०प्र० साहिब) 
अर्थात्- इस घृत से हवन, यज्ञ और पूजा कार्य सुसंपन्न होता है। 
होम जग उरब तप पूजा, 
कोटि तीर्थ इसनान करीजा। 
चरण कमल निमला रिदै धारे, 
गोविंद जपत सभि कारज॥ 
(प्रभाती म०५गु०प्र०) 
अर्थात्- पवित्र हवन, यज्ञ, तप, पूजा, तीर्थ स्नान आदि शुभकर्म मनुष्यों को करने चाहिए। 
गुरुदास जी ने अपनी रचना ‘इकतालीसवीं बार’ में गुरु गोविंदसिंह से संबंधित संस्मरण में लिखा है- 
निज फते बुलाई सति गुरु, कीनी उज्यारा। 
झूठ कपट सब छिप गए, सब सज वरतारा॥ 
फिर जप होम ठहराए कर निज धर्म सँवारा। 
तुर्क दुंद स्तभ उठ गयो, रुचियो जैकारा॥२८॥ 
अर्थात्- दसवें श्री गुरु गोविंदसिंह जी ने अपनी विजय की घोषणा की। अंधेरगर्दी समाप्त की, न्याय का प्रकाश फैलाया और हवन- यज्ञ का प्रचार किया। 
चीफ खालसा दीवान के उपदेशक श्री हरनामसिंह ने अपनी पुस्तक ‘सच्ची मुहब्बत’ में लिखा है- 
यज्ञ होम हीवना न हिंद में भूल पाता, 
फूलते निशान नहीं आज हिंदुस्तान के॥ 
कहत हरनाम सिंह न इसमें झूठ जानो, 
तीर जो न छूटते गोविंदसिंह जवान के॥ 
अर्थात्- यदि योद्धा गुरु गोविंदसिंह के तीर न छूटते तो यज्ञ, होम और धर्म के फलने- फूलने का चिह्न दिखाई न पड़ता। 
नामधारी सिखों के ‘नित्यनियम गुटके’ में लिखा है- ‘‘साहिब गुरु गोविंदसिंह की हवन- यज्ञ के साथ ऐसी प्रीति थी कि आपने सवा लाख दमड़े की सामग्री एकत्र करके नैना देवी के मंदिर में हवन किया था।’’ 
‘पंथ प्रकाश निवास’ में भाई केशवदास जी ने गुरु गोविंदसिंह का अभिमत व्यक्त करते हुए लिखा है- 
जब हम हवन यज्ञ करवै हैं, 
खुश हो जल बहु बरसै हैं। 
दुर्भिक्ष नसै अन्न बहु थैहै। 
सुकृत सब करदे लग जैहै। 
नसै अविद्या विद्या अईहै। 
शूरवीरता दृढ़ प्रगटईहै। 
वर्ण आगामी जन है जेते। 
कायरता कर पर्ण तेते। 
उन्हें हवन की पवन लगे जब। 
शेर विघा उन से होइये सब। 
प्रभुता देह आरोग्य क्रांति विजय। 
ज्ञान संतति सुखदाती गुण सब। 
बालक भाग्यवान प्रकटैहै। 
रोग शीतला आदि नसैहै। 
कामादि जो आसुरी संपत्ति। 
यज्ञ को लखकर कंपति। 
उत्तम गुण सत्यादिक जे है। 
बावन कह वेद ऋग में है। 
सो अवश्य जग में प्रकटे हैं। 
होम यज्ञ विधिवत् जब ये हैं॥ 

उपर्युक्त पद सरल हैं। उनका भावार्थ समझने पर पता चलता है कि सिख धर्म के गुरुओं को यज्ञ- हवन में कितनी सघन आस्था थी। 


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